रंग लाई आसमां को छूने की चाहत विंग कमांडर (सेनि.) अनुपमा जोशी

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Published: 10 February 2017
121 times Last modified on Saturday, 25 February 2017 13:47
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रंग लाई आसमां को छूने की चाहत विंग कमांडर (सेनि.) अनुपमा जोशी

बहुआयामी प्रतिभा की धनी है। उन्होंने जीवन की चुनौतियों का सामना कर आगे बढ़ने का रास्ता तलाशा। वह हालातों के आगे विवश नहीं हुई। वह एयरफोर्स के अनुशासन में बंधी हुई थी। उन्होंने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया, लेकिन महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को भी चुनौती दी। तीनों सेनाओं में महिलाओं के लिए कमिशन उन्हीं की देन है। वह सैनिक होने के बावजूद भावुक हैं, और दूसरों के लिए सोचती हैं। वह अपने वादे की इतनी पक्की हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट से केस जीतने के बाद बावजूद उन्होंने स्थायी कमीशन इसलिए नहीं लिया कि क्योंकि किसी के विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती थीं। उन्होंने पहाड़ को अपने कदमों से नापा है और ग्रामीणों की उन्नति के लिए कार्य किए हैं। अनुपमा ने सपने देखे और उन्हें पूरा करने के लिए वह जी-जान से जुट जाती है। उनका संघर्ष, जुझारुपन और कुछ कर गुजरने की चाहत ही उन्हें आज सफलता के सोपान तक लाया है। अनुपमा के जीवन में आज पड़ाव है, लेकिन उनके अब भी सपने हैं, हौसले की उड़ान से आसमां छूने की। उनके जीवन के विभिन्न पहुलुओं को समेटने की एक कोशिश। 


कहानी यहां से शुरू
दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू)। यहां देशभर की चुनी हुई प्रतिभाएं अपना भविष्य तराशने के लिए एकत्रित होती हैं। जेएनयू की हवा दिल्ली में होते हुए भी दिल्ली से अलग है। उदारवादी और उन्मुक्त सोच यहां पलती है। देश दुनिया के छोटे-बडे़ मुद्दों पर लंबी बहस होती है और जीवन को विकसित और समृद्ध बनाने की बात होती है। ऐसे ही माहौल में अनुपमा जेएनयू से मनोविज्ञान (साइकोलाॅजी) में एमफिल कर रही थीं।


यह 1992 की बात है। वायु सेना ने पहली बार महिलाओं को शामिल करने के लिए रिक्तियां निकाली। तीनों सेनाओं में यह पहल थी। वायु सेना ने अफसर बनने के लिए यह भर्ती निकाली थी। अनुपमा को जब यह पता लगा तो वह उत्सुक हो उठी। वह जीवन में हर बार कुछ नया करने का प्रयास करती थी तो सोचा चलो वायु सेना में भर्ती के प्रयास हों।
देहरादून की डिफेंस कालोनी स्थित आवास में जब वह यह बताने लगी तो एक विजयी मुस्कान सी उनके चेहरे पर तैर गई। कहने लगी कहां जेएनयू और कहां वायुसेना। दोनों एक दूसरे के उलट। जेएनयू का उन्मुक्त माहौल और वायुसेना का अनुशासन। चूंकि मैं पहले से ही नयापन और बदलाव में विश्वास करती थी तो मैंने वायु सेना में जाने का फैसला किया। एक बात और बचपन में से ही मुझे नये प्लान बनाने बनाने और यूनीफार्म पहनने का शौक था। मैं सिविल सर्विस की तैयारी भी कर रही थी और उसमें भी सफल हो जाती, लेकिन मैंने वायुसेना को प्राथमिकता दी। इस परीक्षा में देश भर में 24 हजार से भी अधिक लड़कियों ने आवेदन दिया था और अनुपमा समेत 12 लड़कियों का चयन हुआ था। इस साल की कठिन ट्रेनिंग करने के बाद वायु सेना में फ्लाइंग अफिसर के रूप में कमिशन मिल गया। तब वायु सेना में महिलाओं को फाइटर उड़ाने की छूट नहीं थी। एयरबेस पर ड्यूटी ही मिली थी। वह कहती हैं कि जो वक्त के अनुसार अपने को ढाल लें, वहीं इंटेलीजेंस होती है। यह कहते हुए उनके चेहरे पर एक बार फिर मुस्कराहट तैर गयी। 

पिता की लाडली
अन्नू के पिता अशोक जोशी भारतीय वन सेना में अधिकारी थे। इस कारण उनका परिवार जहां-जहां उनकी तैनाती होती थी, वहीं जाते थे। अनुपमा बताती हैं कि उनका जन्म बैतूल (एमपी) में हुआ और पढ़ाई बैतूल के अलावा भोपाल, शिमला, भूटान, पिलानी, आदि स्थानों में हुई। अनुपमा को उनके पिता से अथाह प्यार और प्रश्रय मिला। उन्होंने लड़की होने बावजूद उसे जीवन में आगे बढ़ने का हर अवसर और प्रोत्साहन दिया। यही कारण रहा कि अनुपमा जीवन में आगे बढ़ती गई। अन्नु की बचपन से साहसिक खेलों के प्रति रुचि थी। उनके पिता ने उन्हें जीवन के हर मोड़ पर प्रोत्साहित किया। 

वायुसेना का अनुषासित जीवन मेरी पहली पोस्टिंग एयरबेस में हुई थी। महिला अफसर को देख वायु सैनिकों में कौतूहल होता था, लेकिन एक बात जो सबसे अहम थी कि वायुसेना लड़कियों के लिए सबसे सुरक्षित है। वहां एयरमैन से लेकर अफसर तक महिलाओं की कद्र करते हैं। वे सभी बहुत ही सपोर्टिंग थे। मेेरे 15 साल के करियर में जेंडर डिसक्रिमिनेशन की बात नहीं आयी। वह हंसते हुए कहती हैं कि उलटे अफसर मेरा काम देखकर कहते थे कि महिलाओं की अपेक्षा कुछ निक्कमे अफसर (जो काम नहीं करते थे) उनको एयरफोर्स से बाहर भेज देना चाहिए। 

पहले पांच साल के लिए मिला था कमीषन 
अनुपमा बताती हैं कि वायुसेना ने पहले पांच साल के लिए उनको कमीशन दिया। कहा गया था कि पहले पांच साल का कार्य देखने के बाद फिर महिलाओं की सेवाओं पर विचार किया जाएगा। जब उन्हें एयरफोर्स में चार साल हो गए तो उनसे लिखवाया गया कि वह क्या करना चाहती हैं। सो उन्होंने लिख दिया कि एयरफोर्स में ही बना रहना चाहती हूं। इसके बाद जब पांच साल हो गए तो उन्हें पांच साल सेवा विस्तार का पत्र मिला। यह बात उन्हें बहुत अखरी। जब पुरुष को कमीशन मिलता है तो उनको पांच साल के बाद स्थायी कमीशन मिल जाता है तो महिलाओं के साथ इस तरह का व्यवहार क्यों?

जब वह इस बात को बता रही थी तो उनके चेहरे पर अपने इरादों को लेकर मजबूती साफ झलक रही थी कि यह महिला जो ठान लेती है फिर पीछे नहीं हटती। चूंकि वह एयरफोर्स में थी, इसलिए पहले उन्होंने यह मुद्दा अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सामने उठाया। वह तीनों चीफ से भी मिलीं। इस संबंध में उन्होंने रक्षा मंत्री और राष्ट्रपति से भी पत्र व्यवहार किया। इस पूरी प्रक्रिया में ही चार-पांच साल लग गए। मेरे सुपीरियर का समर्थन मेरे साथ था। लेकिन कोई कुछ नहीें कर सकता था। बात पालिसी की थी। जब मुझे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला तो फिर मैंने अदालत की शरण लेने की ठान ली। वर्ष 2006 में दिल्ली हाईकोर्ट में स्थायी कमीशन के मुद्दे पर रिट दायर कर दी। 

पति ने दिया हर कदम पर साथ
अनुपमा के पति अशोक शेट्टी भी एयरफोर्स में तैनात थे। वह बताती हैं कि उनके पति ने सेवारत रहते हुए भी हमेशा उनका साथ दिया। ज बवह महिलाओं को स्थायी कमीशन के मुद्दे पर लड़ रही थी तब भी। अनुपमा के अनुसार ज बवह अपने पति से कहती कि कहीं मेरी लड़ाई का असर आपके कैरियर पर तो नहीं पड़ेगा तो वह स्पष्ट कहते, मैं ईमानदारी और देशभक्ति के साथ अपना कार्य कर रहा हूं, तुम्हारी लड़ाई से मेरे कैरियर पर कोई प्रतिकूल असर नहीं होगा। वह पूरी दृढ़ता के साथ मेरे साथ जमे रहे और आज भी जमे हुए हैं। अनुपमा हंसते हुए कहती है कि उनके पति उन्हें कुछ नहीं कहते।

चुनौती और परिवार
जब केस दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहा था तो एक साथ कई साथ कई चुनौतियां थीं। हालांकि एयरफोर्स के मेरे सभी सहयोगी, साथी और वरष्ठि अफसर इस मुद्दे पर मेरा साथ दे रहे थे, लेकिन तनाव और भागमभाग भी खूब हो रही थी। मुझे अक्सर हाईकोर्ट में तारीख होने पर दिल्ली आना पड़ता था और न चाहते हुए भी इसका प्रभाव मेरे जीवन व परिवार पर पड़ रहा था। मेरा बेटा अगस्त्या महज आठ साल का था और मैं उसे समय नहीं दे पा रही थी। इसका मुझे अफसोस था। मैं उन दिनों पहले हैदराबाद में तैनात थी और बाद में बड़ोदा में। मुझे वहां से दिल्ली आना-जाना होता। पर मेरी लड़ाई नीतियों के खिलाफ थी। अदालती लड़ाई पांच साल तक चली। आखिर में मेरी जीत हुई। तब तक एयरफोर्स में मेरे 15 साल पूरे हो चुके थे। वर्ष 2010 में एयरफोर्स से एक पत्र आया कि आप तुरंत एयरफोर्स ज्वाइन कर लें। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। मैं किसी कंपनी से वादा कर चुकी थी और वादा तोड़ना मुझे ठीक नहीं लगा। तो मैंने एयरफोर्स की नौकरी ज्वाइन न करने का फैसला किया। 

माइक्रोफाइनेंस कंपनी की फाउंडर सीइओ
वर्ष 2008 में मैंने चैन्नई की एक फाइनेंस कंपनी आईएफएमआर को इस शर्त पर ज्वाइन किया कि वह अपना काम उत्तराखंड में करेगी। कंपनी ने उनकी शर्त मान ली थी और तब उन्होंने ऋषिकेश में सहस्रधारा फाइनेंशियल सर्विस की स्थापना की। छह-सात माह के बाद कंपनी का आॅफिस जौलीग्रांट में शिफ्ट हो गया। अनुपता बताती हैं कि वह इस कंपनी की फाउंडर सीईओ है। यह कंपनी ग्रामीणों को अल्पबचत के लिए प्रोत्साहित करती है। इस कंपनी को स्टब्लिश करने के लिए उन्होंने गांव-गांव भ्रमण किया और ग्रामीणों को बचत के लिए प्रोत्साहित किया। ज बवह दिल्ली हाईकोर्ट में केस जीती तो उनके लिए कशमकश की स्थिति थी कि क्या करें। एक ओर उनकी लड़ाई थी जो उन्होंने जीत ली तो दूसरी ओर एक कंपनी ने उन पर विश्वास किया था। अनुपमा ने विश्वास तोड़ना उचित नहीं समझा। और एयरफोर्स की नौकरी को छोड़ दिया। उन्होंने चार साल तक इस कंपनी की कमान संभाले रखी और फिर जब कंपनी स्थापित हो गई तो उसे छोड़ने का फैसला किया। अब वह यह वक्त अपने बेटे को देना चाहती थी। 

अब दून स्कूल में डायरेक्टर आॅफ परसनल
वर्ष 2012 वह अपने बेटे के एडमिशन के लिए दून स्कूल गई तो वहां की प्रींसीपल ने उन्हें नौकरी का आफर दिया। चूंकि वह अपने बेटे को अब समय देना चाहती थी इसलिए यह आफर स्वीकार कर लिया। अब अगस्त्या ने 12वीं कर ली है और वह कामर्सियल पायलट बनना चाहता है। वह पायलट का प्रशिक्षण ले रहा है। 

लड़कियों के लिए सेफ है एयरफोर्स 
अनुपमा के अनुसार आज तीनों ही सेनाओं में महिलाओं की अनिवार्यता को समझ लिया गया है। बदलाव हो रहा है। यदि देखा जाए तो सेना महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित है। पुरुष सेना में अधिक हैं, भले ही कुछ पुरुषों को यह लगता है कि कल की आई लड़की हमें आदेश कैसे आदेश दे सकती है, लेकिन अधिकांश महिला अफसरों को पूरा सम्मान देते हैं। वह शिकायती लहजे में कहती है कि जब मैं अपनी लड़ाई लड़ रही थी तो पुरुष अफसरों ने तो मेरा साथ दिया लेकिन महिला अफसरों ने इस लड़ाई में मेरा साथ नहीं दिया। जबकि यह लड़ाई मेरी व्यक्तिगत नहीं थी। आज लड़कियां फाइटर प्लेन उड़ा रही हैं। यह देख खुशी होती है। लड़कियां लड़कों से किसी भी मामले में कम नहीं हैंै। यदि एक लड़की जो कामर्सियल प्लेन को उड़ा रही है और उसके प्लेन में 200-250 यात्री हैं जब उनका विश्वास उस महिला पायलेट पर है तो फिर फाइटर में तो लड़की अकेले होती है।

साभार: उत्तरजन टुडे 

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