माटी का कर्ज चूका रहा हूँ- कर्नल डिमरी

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Published: 06 February 2017
84 times Last modified on Saturday, 11 February 2017 07:53
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पहाड़ के युवाओ के लिए लाइफ लाइन तयार कर रहे है कर्नल डिमरी 

रुद्रप्रयाग में युवाओं के लिए सेण्टर फॉर एक्सीलेंस तैया

 

दून स्थित घंटाघर का काफी कैफे डे। छरहरे बदन का एक लंबा-पतला व्यक्ति हाथ में फाइल लिए हुए था। आंखों में चश्मा, चुस्त-दुरस्त। उम्र का अंदाजा लगाना कठिन था। कैफे डे की कार्नर टेबल पर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो पता चला कि यह शख्स सातवें दशक के शुरुआत में है। हैरत थी कि उम्र के इस पड़ाव में आज भी युवाओं जितनी फुरती और सोच कहीं अधिक। यह व्यक्ति पहाड़ के विकास की पीड़ा को लेकर इन दिनों ऐसे लोगों की तलाश कर रहा है जो राजनीति में शुचिता लाने के लिए दृढ़ संकल्पित हों। स्वच्छ छवि और धरातल पर काम करने वाले लोगों की तलाश करना ठीक ऐसे है जैसे भूसे के ढेर में सुई तलाशना। पर एक बेहतर प्रदेश की परिकल्पना को धरातल पर उतारने के लिए वह शख्स इस मुहिम के प्रति गंभीर है। कभी सेना के लिए संचार (सिग्नल) तैयार करने वाला यह व्यक्ति आज पहाड़ के युवाओं के लिए भी लाइफ लाइन जुटा रहा है।
यह कहानी कर्नल डीपी डिमरी की है।सिग्नल कोर में तैनात रहे कर्नल डिमरी उत्तराखण्ड के भविष्य के लिए चिन्तित है। वह पहाड़ से पलायन रोकने की दिशा में काम कर रहे है। उनका मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रो के युवाओं का स्किल डेवलप किया जाए तो पलायन तो रूकेगा ही साथ ही प्रदेश की आर्थिकी भी कहीं अधिक मजबूत होगी। 


टेक्नोक्रेट देव में रही सीखने की ललक 
रूद्रप्रयाग जिले के सेम गांव निवासी कर्नल डिमरी में आत्मविश्वास व कुछ कर गुजरने की ललक बचपन से ही रही। उनके पिता पटवारी थे। दो बहनें व तीन भाई हैं। उनका बचपन दून के पथरी बाग में बीता। पढ़ाई लक्ष्मण विद्यालय से की। वर्ष 1966 में उन्होंने एमएससी फिजिक्स में किया। रोजगार के मामले में उनकी किस्मत गजब की थी। 30 जून को उन्होंने एमएससी किया और दस जुलाई को वह मसूरी डिग्री कालेज में लेक्चरार बन गये। पढ़ाई में वह शुरू से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। महंत इंद्रेश उनसे इतने अधिक प्रभावित थे कि उन्हें पढ़ने के लिए दरबार साहिब में अलग से रूम दिया था। वह हंसते हुए बताते हंै कि जब उन्होंने मसूरी डिग्री कालेज की नौकरी की तो महंत नाराज हुए कि उनके यहां क्यों नहीं लेक्चरार बने।

आईएएस बनना चाहते थे बन गये फौजी
 कर्नल डिमरी के अनुसार वह आईएएस बनना चाहते थे और इसके लिए तैयारी कर रहे थे। लिखित परीक्षा पास भी कर ली थी लेकिन इंटरव्यू में रह गए। इस बीच वर्ष 1979 में उन्हें सेना में जाने का अवसर मिला और वह ओटीए पहुंच गए। उन्हें कोर आॅफ सिग्नल में कमीशन मिला। कमीशन मिलने के दो माह बाद ही उन्हें 1971 की लड़ाई में भेज दिया गया। उस समय वह कैप्टन थे और मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी(तब ले. कर्नल) के साथ मोर्चे पर तैनाथ थे। कर्नल डिमरी बताते हैं कि जनरल खंडूड़ी रोज शाम को हम दो अफसरों को अपने पास बुलाते थे। 

सेना में रहते हुए किया एमटेक और एमबीए
सेना में कर्नल डिमरी ने कई अहम कार्य किए। मोबाइल नेटवर्क का सर्वे भी इसमें शुमार है। उन्होंने भूटान में भी ढाई साल गुजारे। सेवा के दौरान उनकी सीखने की ललक बनी रही और उन्होंने एमटेक और एमबीए भी किया। सेवा से रिटायर होने के बाद उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से कारपोरेट एचआर में पीएचडी की। 26 साल देश सेवा के बाद वह सेवानिर्वत्त हो गये।

निजी क्षेत्र में कई अहम पदों पर काम
सेना से रिटायर होते ही उन्हें तुरंत ही एयरटेल में वाइस प्रेसीडेंट की पोस्ट मिल गई थी। इसके बाद वर्ष 1998 में ट्रापीकाना टेलीकाॅम में उन्हें फाउंडर सीईओ का चुनौती भरा जाॅब मिला, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा और योग्यता के दम पर बखूबी निभाया। इस दौरान उन्होंने विदेशों की यात्रा की और वहां की मोबाइल तकनीकों को समझा। यह कंपनी प्रख्यात उद्यमी जेआर देसाई की थी। उन्होंने छह साल तक इस कंपनी के सीईओ पद पर काम किया। उन्होंने कंपनी को जीरो से 46 करोड़ तक का बना दिया। वर्ष 2004 में वे तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की महत्वाकांक्षी परियोजना इंडियन सोसायटी फाॅर ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट (आईएसटीडी) से भी जुड़े। इसके तहत देश में स्किल डेवलपमेंट किया जाना था। इस दौरान वह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन से भी जुड़े रहे। 

टेक्सटाइल मिनिस्ट्री में एडवाइजर
कर्नल डिमरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के द्वितीय कार्यकाल के दौरान कपड़ा मंत्रालय में सलाहकार चुना गया। उन्हें देशभर में स्किल डेवलेपमेंट और प्रशिक्षण के लिए 125 सेंटर बनाने की जिम्मेदारी मिली। दो साल की अवधि में ही ये संेटर खोले जाने थे। इसके तहत उन्होंने देशभर का दौरा किया और सेंटर के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सेंटर के लिए जमीन मांगी। राज्यों को महज जमीन उपलब्ध करानी थी, जबकि सारा खर्च केंद्र को उठाना था। 

क्या है नवीन व निशंक में अंतर
कर्नल डिमरी बताते हैं कि जब वह स्किल डेवलपमेंट एंड टेªनिंग सेंटर के बारे में उड़ीसा गए तो तय किया गया था कि वह उस राज्य को दस सेंटर देंगे। जब वह उड़ीसा के चीफ सेक्रेट्री के साथ इस संबंध में बात कर रहे थे तो तत्कालीन सीएम नवीन पटनायक चीफ सेके्रट्री के कक्ष में स्वयं ही आ गए और योजना के बारे में जानने लगे। जब मैंने उन्हें प्रेजेंटेशन दी और यह बताया कि दस सेंटर उड़ीसा को देने हैं तो वह जिद करने लगे कि इतना बड़ा प्रदेश है। यहां बीस सेंटर खोलें। उन्होंने कहा िकवह टेक्सटाइल मिनिस्टर से बात कर सकते हैं। उन्होंने इस प्रोजेक्ट में जबरदस्त रुचि ली। मैंने कहा कि मिनिस्टर साहब भी मुझे ही कहेंगे। आखिरकार मैंने दो सेंटर यानी उड़ीसा 12 सेंटर बनाने पर सहमति दे दी। इसके विपरीत जब वह उत्तराखंड आए, तो तत्कालीन सीएम रमेश पोखरियाल निशंक थे। निशंक ने अधिकारियों से कहा कि कर्नल साहब बहुत अच्छा प्रोजेक्ट लाए हैं। मैंने तीन सेंटर-एक पिथौरागढ़, एक देहरादून व एक अगस्त्यमुनि में खोलने का प्रस्ताव रखा। योजना की सराहना तो हुई पर जमीन आज तक नहीं मिली। न तो निशंक सरकार और न ही अन्य सरकारों ने इसमें रुचि ली। इस संबंध में वह सितंबर 14 में सीएम रावत से भी मिले थे, सेंटरों का क्या हुआ, पता नहीं।
 
पहाड़ के लिए धड़कता है दिल 
पर्वतीय जिलों से पलायन को लेकर कर्नल डिमरी बहुत चिंतित हैं। उन्होंने यहां के युवाओं की पीड़ा को समझा और इस दिशा में धरातल पर काम करना शुरू किया। वह बताते हैं कि सेना में रहते हुए उन्होंने समाज सेवा करनी शुरू कर दी थी। उन्होंने अपने गांव के स्कूल में स्कालरशिप की शुरुआत की थी। स्कूल में लाइब्रेरी बनवाई। वह दिल्ली की प्रसिद्ध उत्तरायणी संस्था से भी जुड़े हैं। उत्तरायणी उत्तराखंड के अफसरों की संस्था है। इस संस्था का अध्यक्ष आईएएस अधिकारी ही होता है लेकिन मैं इस संस्था का पांच साल अध्यक्ष रहा। वह बताते हैं कि उत्तरायणी संस्था ने केदारनाथ आपदा के बाद वहां के ग्रामीणों की मदद करने का फैसला किया। इसके तहत इंडियन आयल से बात की गई। इंडियन आयल ने एक करोड़ 35 लाख रुपये का फंड आपदा प्रभावितों के लिए तय किया। इसके तहत एक गांव को गोद लिया जाना था। इंडियन आयल और उत्तरायणी की टीम ने गांव का दौरा किया। इस टीम की अगुवाई मैं कर रहा था। जब हम उखीमठ ब्लाक के गांवों का दौरा कर वापस लौट रहे थे तत्कालीन डीएम ने मुझसे कहा कि गांव तो कई संस्थाएं गोद ले रही हैं लेकिन कुछ ऐसा किया जाए कि यहां के युवाओं की हालत सुधरे। उनके अनुसार वह अपनी माटी का कर्ज चुका रहे हैं। 

रुद्रप्रयाग सेंटर फाॅर एक्सीलेंस की तैयारी
वापस लौट कर हमने विचार किया और तय किया कि रुद्रप्रयाग में युवाओं के लिए सेंटर फाॅर एक्सीलेंस बनाया जाएगा। इसमें पहाड़ के युवाओं को रोजगार संबंधी जानकारी व ट्रेनिंग दी जाएगी। कर्नल डिमरी के अनुसार पहाड़ के अधिकांश युवाओं को जानकारी नहीं मिलती कि सेना में भर्ती कब है या एनडीए या डीडीएस के फार्म कब निकलते हैं। आईएएस की तैयारी तो दूर की बात है। अब इस सेंटर में सिपाही और क्लर्क से लेकर अफसर और आईएएस की तैयारी की जाएंगी। यह सेंटर तीन मंजिला बनकर तैयार हो गया है। इस सेंटर के लिए डायरेक्टर की तलाश चल रही है। उम्मीद है कि जल्द ही यहां ट्रेनिंग देने का काम शुरू हो जाएगा। 
हाॅस्टल के लिए ओएनजीसी ने बढ़ाए मदद को हाथ
कर्नल डिमरी के अनुसार चंूकि यहां प्रदेश भर के युवा प्रशिक्षण व पढ़ने के लिए आएंगे तो हाॅस्टल भी चाहिए था। रुद्रप्रयाग के डीएम ने हाॅस्टल के लिए जमीन उपलब्ध करा दी है। हाॅस्टल के लिए हमने ओएनजीसी से बात की और वह इसके निर्माण कार्य के लिए धनराशि जारी करने को राजी हो गया। ओएनजीसी ने हाॅस्टल के लिए 97 लाख रुपये दिए हैं। 
एयरपोर्ट अथारिटी भी मददगार 
पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं को रोजगार दिलाने की दिशा में एयरपोर्ट अथारिटी ने भी मदद को हाथ बढ़ाया। अथारिटी ने 100 युवाओं को प्रशिक्षण के लिए 29 लाख रुपये दिए हैं। यानी हर युवा के लिए 29 हजार रुपये। इसके लिए हापुड़ के एक संस्थान के साथ करार किया है। यह धनराशि संस्थान को प्रशिक्षण के लिए युवाओं को आने-जाने व वहां रहने के खर्च के तौर पर दिया जाता है। प्रशिक्षण फ्री है। आटोमोबाइल सेक्टर में भी गुड़गांव के मारुति और अशोक लेलैंड में नौकरी दी जाती है। 

उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर
कर्नल डिमरी बताते हैं कि उत्तराखंड में उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में भी वह काम कर रहे हैं। इसके तहत हम ग्रामीणों को सामूहिक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसके तहत आशिंक चकबंदी की जा रही है। सात गांवों में यह योजना लागू की जा रही है। इसमें जैविक उत्पादों की खेती की जाएगी और इसकी बिक्री केंद्रीय भंडारों के माध्यम से की जाएगी। 
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बदहाली के लिए भाजपा-कांग्रेस जिम्मेदार
कर्नल डिमरी मानते हैं कि उत्तराखंड की बदहाली और पलायन के लिए भाजपा और कांग्रेस नीत सरकारें जिम्मेदार रही हैं। यहां के नेताओं ने राज्य हित से कहीं अधिक निजी स्वार्थ को तवज्जो दी। यही कारण रहा कि पर्वतीय क्षेत्र व सीमांत गांव आज भी विकास से अछूते हैं और ग्रामीण शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। नेताओं में इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता का अभाव है, ऊपर से अधिकांश नेता भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबे हुए हैं। चंूकि जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है इसलिए जनता बारी-बारी से भाजपा-कांग्रेस को ही चुनती है। कर्नल डिमरी के अनुसार वह और प्रदेश के कई बुद्धिजीवी नये विकल्प व नये राजनीतिक चेहरों की तलाश कर रहे हैं ताकि राजनीति में शुचिता को लाया जा सके। इस दिशा में काम किया जा रहा है। क्षेत्रीय दलों को भी संगठित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। हमारा प्रयास है कि निष्कलंक और साफ छवि के लोगों को राजनीति में आगे लाया जाए। इसके लिए एक अपैक्स बाडी तैयार की जा रही है। इसमें बुद्धिजीवी लोगों को जोड़ा जाएगा। इसके बाद भावी रणनीति तैयार की जाएगी।

 

साभार :उत्तरजन टुडे

 

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