INTERVIEW / PERSONALTY

पहाड़ के लिए धड़कता दिल फ्रेंड्स ऑफ हिमालय
- केदारनाथ आपदा प्रभावितों के कल्याण में जुटा है प्रवासी लोगों का संगठन
-उत्तराखंडी संस्कृति और उत्पादकता को बढ़ावा दे रहा संगठन

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समाजसेवी प्रेम बहुखंडी का फोटो 

दिल्ली व देश के विभिन्न इलाकों में रहने वाले कुछ प्रवासी उत्तराखंडियों का दिल आज भी पहाड़ के लिए धड़कता है। उनकी सोच है कि पहाड़ फिर से आबाद हो। अपनी थाती और माटी से भावनात्मक रूप से जुड़े कुछ प्रवासी पहाड़ को लेकर जो सपने देखते हैं, उनको धरातल पर उतारने का भी प्रयास करते हैं। ऐसे ही पहाड़ के विकास के लिए समर्पित और संकल्पित प्रवासियों का समूह है फ्रेंड्स आॅफ हिमालय।
यह संगठन वास्तविकता के धरातल पर पहाड़ में काम कर रहा है। फ्रेंड्स आॅफ हिमालय केदारनाथ आपदा में मारे गये लोगों के बच्चों को पढ़ाई में मदद दे रहा है। पिछले तीन साल से वह सामाजिक संस्था धाद के साथ मिलकर 200 से भी अधिक आपदा प्रभावित बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन कर रहा है। इसके अलावा इन बच्चों का स्किल डेवलमेंट का प्रयास भी कर रहा है। संगठन केदारनाथ घाटी की महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा मे काम कर रहा है। इसके तहत संगठन ने धाद के साथ मिलकर महिलाओं के लिए तीन सिलाई-बुनाई सेंटर चला रहा है। इसके अलावा उत्तराखंडी खाद्यान्न एवं प्रसंस्करण स्वायत्त सहकारिता संगठन भी बनाया है। यह संगठन पहाड़ी खाद्यान्न को बढ़ावा दे रहा है ताकि उत्पादकता बढ़ सके और इसका लाभ ग्रामीणों को मिल सके।

उन्नाव जेल में पड़ी संगठन की नींव
फ्रेंड्स आॅफ हिमालय संगठन की बुनियाद उन्नाव जेल में पड़ी। संगठन के प्रेम बहुखंड़ी के अनुसार वर्ष 1994 के दौरान उत्तराखण्ड़ राज्य अपने चरम पर था। वे उन दिनों देहरादून के डीएवी कालेज में पढ़ रहे थे। आंदोलन के दौरान उन्हें व अन्य युवाओं को गिरफ्तार कर उन्नाव जेल भेज दिया गया। जेल में हमने एक संगठन बनाने की सोची जो कि उत्तराखंड के लिए समर्पित हो और पहाड़ के विकास के लिए योजनाओं को धरातल पर उतार सके। पहले संगठन का नाम फ्रेंड्स आॅफ उत्तराखंड था। इसके बाद वर्ष 1999 में मै जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में एमफिल करने के लिए गया तो वहां के रिचर्ड स्टूडेंट्स ने इस नाम पर आपत्ति जतायी तो संगठन का नाम फ्रेंड्स फ्राॅम उत्तराखंड रख दिया गया। वर्ष 2006 में संगठन का नाम बदल कर फ्रंेड्स आॅफ हिमालय रखा गया।

घराट को लेकर रही अहम भूमिका
राज्य गठन के बाद वर्ष 2002-03 में संगठन ने उत्तराखंड में घराट को लेकर व्यापक बहस छेड़ी। संगठन के अनुसार यदि पर्वतीय इलाकों में घराटों को ही अच्छे से संचालित किया जाता तो वहां की आर्थिकी में सुधार होता और पलायन की समस्या को कुछ हद तक रोका भी जा सकता था।
प्रेम बहुखंडी का मानना है कि जब तक हम तकनीकी विकास नहीं करेंगे तो आर्थिकी में सुधार नहीं हो सकता है। हमें विकास के लिए योजनाओं के साथ ही तकनीकी विकास पर भी जोर देना होगा। आम जनता तक तकनीकी जानकारी पहुंचनी चाहिए। फ्रेंड्स आॅफ हिमालय ने हिमाचल के चंबा में भी तकनीकी सपोर्ट का काम किया। इसके अलावा दिल्ली सरकार के सामाजिक सुविधा केन्द्र के प्रोजेक्ट टेक इंडिया के तहत बच्चों व आम लोगों को फंग्शनल इंग्लिश यानी अंग्रेजी की काम चलाऊ जानकारी देने का काम भी किया।

आपदा के बाद केदारघाटी में सक्रिय संगठन
प्रेम बहुखंडी बताते हैं कि जब वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा आई तो धाद के सचिव तन्मय ममगाईं दिल्ली आए। उन्होंने कहा कि आपदा प्रभावितों के लिए कुछ किया जाना चाहिए। उस दौरान प्रभावितों की मदद के लिए सब कुछ न कुछ कर ही रहे थे लेकिन मुझे लगा कि आपदा के बाद पहाड़ से मानव तस्करी बढ़ सकती है, विशेषकर बच्चों की। तो हमने यह तय किया कि आपदा प्रभावित बच्चों को स्कालरशिप दें ताकि उनकी पढ़ाई न छूटे और भविष्य खतरे में न पड़े। हमने तय किया कि पहले दस-दस बच्चों को न्यूनतम खर्चा दें ताकि उनकी पढ़ाई न रूके। तय किया गया कि वर्ष में दस हजार रूपये एक बच्चे की पढ़ाई पर खर्च किये जायेंगे। वहां की प्रभावित महिलाओं के लिए रिन्यू हिमालय के नाम से लमगौड़ा,सारी व किमोड़ा गांव मेें सिलाई-बुनाई सेंटर खोले गये।

स्किल डेवलपमेंट के प्रयास
प्रेम का कहना है कि आपदा प्रभावित बच्चे क्या सीख रहे हैं,उसकी समीक्षा के लिए हमने उन स्कूलों के शिक्षकों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद ली और समर कैम्प में बच्चों की गतिविधियों का ऐसेमेंट किया। इस वर्ष जून माह में सारी गांव में कैम्प लगाया गया। मेरा मानना है कि एक्पोजर मिले तो ही आगे बढ़ने के लिए रास्ता मिलता है। आपदा प्रभावित बच्चों में स्किल डेवलपमेंट के प्रयास किये जा रहे हैं। इसके तहत उन्हें कंप्यूटर ज्ञान के साथ ही अन्य विधाओं की जानकारी भी दी जा रही है। इसके अलावा गणित व विज्ञान की शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। महिलाओं को कृषि और बागवानी की तकनीकी व वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है।

आपदा प्रभावितों की आजीविका
प्रेम बहुखंडी का एक बड़ा अहम सवाल है कि केदारनाथ आपदा के बाद की स्थिति के लिए मंदिर प्रशासन को क्यों नहीं जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता ? क्या मंदिर प्रशासन का कोई नैतिक दायित्व नहीं ? इस सवाल को अब तक किसी ने नहीं उठाया है। प्रेम के अनुसार मंदिर प्रशासन को प्रभावितों के जीवन को पटरी पर लाने के लिए प्रयास करने चाहिए। इसी सोच के तहत संगठन अब केदारनाथ मंदिर के प्रसाद को स्थानीय उत्पाद के साथ जोड़कर देख रहा है। संगठन मंदिर समिति के साथ मिलकर प्रसाद की व्यवस्था करने की दिशा में काम कर रहा है ताकि इस प्रसाद से होने वाली आय से स्थानीय लोगों को लाभ मिले। प्रेम कहते हैं कि हर साल चारधाम यात्रा पर आने वाले लोग करोड़ रूपये से भी अधिक का प्रसाद लेते हैं तो इसका लाभ स्थानीय लोगों को मिलना चाहिए। प्रसाद में क्या-क्या दिया जाए इस पर विचार किया जा रहा है। यह प्रसाद पूरी तरह से स्थानीय उत्पादों का ही होगा। उम्मीद है कि अगले वर्ष यह योजना धरातल पर उतर आयेगी। हमारा प्रयास है कि आपदा प्रभावित विधवाएं प्रसाद बनाएं और इसका लाभ उन्ही को मिले।


प्रेम बहुखंडी मूल रूप से पौढ़ी गढ़वाल के तलांई पट्टी के नौगांव निवासी हैं
मौजूदा समय में वह राज्यसभा टीवी में कार्यरत हैं और हर सप्ताह यह भी है मुद्दा के हेड हैं। देहरादून में डीएवी से एमए करने के बाद प्रेम ने जेएनयू से एमफिल किया। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उनका अहम योगदान रहा। सर्व शिक्षा अभियान में उनकी प्रमुख भूमिका रही। वह इसके राष्ट्रीय सलाहकार रहे। उन्होंने स्वामी अग्निवेश के साथ कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए टंकारा से अमृतसर तक रैली निकाली। ग्राम विकाश के लिए कपाट में कार्य किया। वर्ष 2008 में कांग्रेस के प्रचार केंद्र वार रूम से जुड़ गये और 2009 में वह वार रूम रिसर्च विंग के समन्वयक रहे। वह कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के भाषण तैयार करते थे। इसके बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई तो वह संसदीय कार्य मंत्रालय में केन्द्रीय मंत्री पवन बंसल के अतिरिक्त निजी सचिव और बाद में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के निजी सचिव रहे। वर्ष 2014 में उन्होंने राज्यसभा टीवी ज्वाइन किया। इसके अलावा गुजरात में दलित आंदोलन में भी उनकी अहम भूमिका रही है। प्रेम बहुखंडी भले ही देश के किसी भी कोने में रहे हों, लेकिन उनकी सोच और दिल में पहाड़ ही बसता है।


साभार: उत्तरजन टुडे

 


परिवर्तन से ही होगा विकास: मोहन काला
-पर्वतीय क्षेत्रों में हर 25 किमी पर खुलें तकनीकी संस्थान 
-प्रदेश में औद्योगिक निवेश के लिए बने उचित वातावरण
-जनता हो जागरूक: करे फैसला, क्या सही-क्या गलत

प्रदेश के नामी उद्यमी और समाजसेवक मोहन काला राज्य गठन के बाद से पर्वतीय क्षेत्रों की उपेेक्षा और वहां के पिछड़ेपन को लेकर बहुत चिंतित हैं। उनका कहना है कि प्रचुर प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद हमारे नेताओं में दूरदर्शिता का अभाव है और अकर्मण्यता के चलते पहाड़ पर विकास नहीं हो पा रहा है। पिछले 17 वर्षाें में भी सरकार यहां बुनियादी सुविधाएं नहीं जुटा सकी है, ऐसे में यहां पर्यटन और उद्योग में निवेश कैसे आकर्षित होगा। वह मानते हैं कि जब तक व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक विकास होना संभव नहीं है। प्रदेश के विभिन्न मुद्दों पर उनसे हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश:- 
आप पिछले लंबे समय से श्रीनगर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में समाजसेवा कर रहे हैं। गांवों में किस तरह की समस्याएं हैं।


अलग राज्य हासिल करने के लिए जो अवधारणा थी, उसके पीछे हमारे गांव थे। सब चाहते थे कि पर्वतीय गांवों का विकास हो। गांव के अंतिम छोर तक विकास की किरण पहंुचे और पलायन रुके। पहाड़ आबाद हों। विडंबना है कि राज्य गठन के 17 साल बीत चुके हैं लेकिन अब तक हमारे नीति-नियंता विशेषकर राजनेता न तो अल्पकालीन और न ही दीर्घकालीन ऐसी नीति बना सके, जिससे पहाड़ आबाद हो सकें। पलायन का क्रम लगातार जारी है। पहाड़ खाली हो रहे हैं। सबसे अहम बात यह है िकइस अवधि में गांवों में बिजली-पानी, शिक्षा-स्वास्थ्य, सड़क आदि बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। ग्रामीण रोजगार सृजित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किये गये। गांवों में शिक्षा का स्तर बहुत कम है। शिक्षा का आधार रोजगारपरक होना चाहिए था लेकिन शिक्षा का पुराना ढर्रा ही चल रहा है। गुणवत्तपरक शिक्षा की कमी है। ऐसे में जब गांव में रहने वाले लोगोें को अपने नौनिहालों का भविष्य और रोजगार की चिंता सताती है तो वह मैदानों का रुख कर लेते हैं। गांवों की हालत बहुत सोचनीय है पर नेता वहां वोट के लिए जाते हैं और फिर पांच साल दोबारा रुख नहीं करते। दिल्ली या देहरादून के एसी कमरों में बैठ ग्रामीणों की किस्मत का फैसला होता है।

पहाड़ के पिछड़ेपन और बेरोजगारी के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
देखिए, प्रकृति ने हमें प्रचुर संसाधन दिये हैं। हिमाचल प्रदेश के मुकाबले में उत्तराखंड के पास अधिक प्राकृतिक संपदा है। हमारे पास नदियां हैं, गाड-गदेरे हैं, सुंदर पहाड़ हैं, झरने हैं, जड़ी-बूटियां हैं। जैविक उत्पाद हैं। देश में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है कि जहां चार धाम हों। और सबसे अहम बात कि मानव संसाधन भी हैं। मानव संसाधन के लिए दो अहम जरूरतें होती हैं-स्वस्थ दिमाग और स्वस्थ शरीर। उत्तराखंड में बुद्धिजीवियों की कमी नहीं। हम केरल के बाद सर्वाधिक साक्षर हैं और स्वस्थ शरीर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड ही देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां दो-दो रेजीमेंट यानी गढ़वाल और कुमाऊं रेजीमेंट हैं।
इसके बावजूद हम प्राकृतिक संपदा को रोजगार में बदलने की कारगर नीतियां नहीं बना सके। हम भले ही दावा कर रहे हैं कि उत्तराखं डमें औसत आय बहुत अधिक है लेकिन यदि पहाड़ व मैदान की बात की जाए तो हालत बहुत खराब है। सरकारी नीतियां और लापरवाही इस दशा के लिए जिम्मेदार हैंै। हमने अपने संसाधनों का सदुपयोग नहीं किया। 

राज्य की इंडस्ट्रियल पालिसी को आप कितना कारगर मानते हैं?
कोई भी नीति तभी सफल होती है जबकि उस नीति के समस्त पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया गया हो। नीति में खामियां होने से इसकी सफलता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए जरूरी है कि उसके लिए एक वातावरण तैयार किया जाए। यानी कनेक्टिविटी, कम्युनिकेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर। हमारी नीति ऐसी नहीं है। सरकार चाहती है कि निवेश हो, पर औद्योगिक वातावरण कहां है? हिल पालिसी बनी है लेकिन संसाध्न तो विकसित ही नहीं किये गये। सतपुली या सुमाड़ी की बात की जाए तो यहां औद्योगिक निवेश की बात हुई है लेकिन संसाधन हैं कहां जो यहां निवेशक आएं।
जो निवेश करेगा, उसे करों में राहत के साथ ही अन्य सुविआएं भी चाहिए। पहाड़ में सड़कें अच्छी कहां हैं? जहां प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र बनाए गये हैं वहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। हमें निवेशकों को मैदान के मुकाबले पहाड़ में अधिक सब्सिडी और करों में छूट देनी होगी। उनके लिए संसाधन विकसित होंगे, माहौल तैयार होगा और निवेशकों को लगेगा कि उन्हें लाभ होगा तो ही वे निवेश करेंगे, नहीं तो ऐसी नीतियां बनेगी तो बहुत लेकिन कारगर साबित नहीं होगी। इंडस्ट्री पालिसी के लिए औद्योगिक संगठनों का भी सहयोग लेना चाहिए। 

स्किल डेवलपमेंट एक बड़ा सवाल है। किस तरह से स्किल्ड लेबर तैयार किया जा सकता है?
बुनियाद रोजगारपरक शिक्षा की है। आज पर्वतीय इलाकों में 12वीं कक्षा तक साइंस की शिक्षा हासिल करने के लिए नौजवानों को गांव से मीलों दूर जाना पड़ता है। जो दूर नहीं जा सकते हैं उन्हें न चाहते हुए भी कला विषय लेने पड़ते हैं। ऐसे में उनका भविष्य शुरू होने से पहले समाप्त हो जाता है। और वह क्लर्की और मजदूरी के सिवाय कुछ नहीं सोच पाते। सरकार को चाहिए था कि वह ग्रामीण इलाकों में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करती। गांव के बच्चों को आज भी आईटीआई पाॅलीटेक्निक या इंजीनियरिंग करने के लिए शहर आना पड़ता है। दूसरे यदि कहीं संस्थान हैं भी तो उनमें क्वाॅलिटी एजुकेशन का अभाव होता है। ऐसे में जब प्रतिस्पर्धा होती है तो ग्रामीण बच्चे पिछड़ जाते हैं। सरकार को चाहिए कि गांवों में 25 किलोमीटर के दायरे में ही तकनीकी शिक्षण संस्थान खोलें ताकि गरीबों के बच्चे भी तकनीकी शिक्षा हासिल कर सकें। हमारे यहां के नौजवान तकनीकी शिक्षा न मिलने पर अनस्किल्ड रह जाते हैं। ऐसे में जब वह नौकरी के लिए संघर्ष करते हैं तो उनके हाथ निराशा ही लगती है। 

पर्वतीय इलाकों में लघु एवं कुटीर उद्योग कितने सफल हो सकते हैं? 
हमारे प्रदेश में लघु एवं कुटीर उद्योगों की ही जरूरत है। गांवों के निकट इन उद्योगों को स्थापित किया जा सकता है। सरकार को संसाधन जैसे-कोल्ड स्टोरेज व मार्केटिंग के लिए साधन मुहैया कराने होंगे। हमारे यहां हथकरघा के अलावा कई ऐसे उत्पाद हैं, जिनसे रोजगार मिल सकता है। माल्टा, बुरांश का जूस शहद व मशरूम के अलावा जड़ी-बूटी पर आधारित दवाई की छोटी इकाईयां भी लगाई जा सकती हैं। इसमें बड़ी संख्या में ग्रामीणों को रोजगार मिल सकता है और पलायन को रोकने में भी यह योजना कारगर साबित हो सकती है, बशर्ते सरकार इस दिशा में गंभीरता अमल करे। 
पर्यटन भी रोजगार का एक बड़ा साधन हो सकता है। क्या कारण है कि हम पर्यटन उद्योग को हिमाचल की तर्ज पर विकसित नहीं कर पा रहे हैं?
जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि हमारे यहां प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है, लेकिन नीति अच्छी न होने से हम सैलानियों को अधिक आकर्षित नहीं कर पाते हैं, जो हमारे यहां आते भी हैं उनका अनुभव बुरा होता है। यदि हम पर्वतीय इलाकों में प्र्यटन के लिए जाएं तो सबसे बड़ी समस्या अच्छे होटलों की है। तीर्थाटन के लिए आए सैलानी किसी भी तरह से गुजारा कर लेते हैं लेकिन जो घूमने आते हैं उन्हें सुविधाएं चाहिए जो हम उन्हें मुहैया नहीं करा पाते। श्रीनगर से गुप्तकाशी तक शौचालय का अभाव है। अच्छे होटल नहीं हैं, सड़कें नहीं हैं, सरकार ने 17 वर्षाें में नये पर्यटन स्थलों को विकसित नहीं किया। चार धाम यात्रा को छोड़ दिया जाए तो पर्यटन का सारा बोझ नैनीताल और मंसूरी पर ही है। गढ़वाल में तो पर्यटन को विकसित करने का प्रयास भी नहीं किया गया है। जरूरत इस बात की है कि पर्यटन नीति धरातल पर बने और बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं। 

पर्वतीय इलाकों में कृषि और बागवानी से क्या आर्थिकी में सुधार संभव है?
बिलकुल, उत्तराखंड जैविक उत्पादन करने वाला एक बड़ा प्रदेश बन सकता है। मैदानों में पानी में केमिकल मिलने से ही उत्पाद जहरीले हो रहे हैं। ऐसे में यदि हम अपनी खेती का वैज्ञानिकी करण करें और नकदी फसलों पर ध्यान दें तो इससे गांवों की तस्वीर व तकदीर बदल सकती है। प्रदेश सरकार ने कोदा झंगोरे के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है वह काफी कम है। सरकार यदि एमएसपी में घाटा भी हासिल करती है तो भी सरकार को यह घाटा उठा लेना चाहिए। यदि किसानों को प्रोत्साहन मिलेगा तो रोजगार भी सृजित होगा। सरकार को इन उत्पादों को स्वयं खरीदना चाहिए और मार्केट सुविधा देनी चाहिए। हमारी नकदी फसलें रोजगार का साधन बन सकती हैं। 

राज्य में विकास किस तरह से होगा? क्या क्षेत्रीय दलों की विकास में कोई भूमिका होगी? 
परिवर्तन से ही विकास हो सकता है। राजनीति में नये चेहरे आने चाहिए। नहीं तो वही ढाक के तीन पात। यूकेडी का बिखराव प्रदेश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा। जनता में भी जागरुकता की कमी है। परिवर्तनलाने के लिए जनता को जागरुक करना होगा, तभी अकर्मण्य नेताओं से पीछा छूटेगा। जनता को यह जानना होगा कि क्या उनके लिए अच्छा है और क्या बुरा। दलों की अंधी दौड़ में शामिल होने का अर्थ है कि प्रदेश को एक बार फिर से विकास की होड़ से बाहर करना। यदि क्षेत्रीय दल ईमानदारी से काम करते तो आज हालात कहीं बेहतर होते। हमारे प्रदेश की जनता को दिल्ली का मंुह नहीं ताकना पड़ता।

 

साभार : उत्तरजन टुडे

 

ओएनजीसी में टिप्टी मैनेजर हैं डा. बीएम डबराल
-पर्वतारोहण के 30 से भी अधिक अभियान सफलतापूर्वक किए हैं पूरे
-पहाड़ के हितों के लिए कर रहे हैं कार्य

देहरादून का मोथरावाला। यहां के एक पहाड़ीनुमा दो मंजिले मकान के गेट पर पहुंचता हूं। यह भवन डा. बृजमोहन डबराल का है। गेट पार करते ही भवन परिसर में चारों ओर हरियाली नजर आती है। एक छोटा सा तालाब जिसमें कमल की विभिन्न प्रजातियां तैर रही हैं। परिसर में डेढ़ सौ से भी अधिक प्रजातियों के पेड़-पौधे। यहां प्रकृति मुस्करा रही थी और साथ में डा. डबराल भी। छरहरे बदन और विनम्र स्वभाव के डा. डबराल बुलंद इरादों के स्वामी हैं। वह जो ठान लेते हैं कर गुजरते हैं। वो अनुशाशित हैं और पहाड़ की तरह अडिग। 
डा. डबराल ओएनजीसी देहरादून में डिप्टी मैनेजर के तौर पर कार्यरत हैं। उनके हौसलों व कुछ कर गुजरने की हसरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 43 वर्ष की आयु में भी कामेट जैसी विषम चोटी पर फतह हासिल कर ली। वह ओएनजीसी के पर्वतारोहण और टेªकिंग के 30 से भी अधिक अभियानों के लीडर रहे हैं।

दादा जी बने प्रेरणास्रोत
डा. डबराल का जन्म पौड़ी गढ़वाल के डबरालस्यूं पट्टी के डबोली गांव में हुआ। पिता सरकारी नौकरी में थे। दो भाई और दो बहन हैं। दादा जी श्री भोला दत्त डबराल स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका गढ़वाल में बड़ा नाम था। उनके आदर्श व देशभक्ति से डा. बृजमोहन के जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। वह चाहते थे कि अपने दादा जी की तरह उनका बड़ा नाम हो। यह ललक बचपन से ही थी कि किसी तरह से अपने परिवार का नाम रोशन करना है। तय कर लिया था कि कोई ऐसा काम करूंगा जो किसी ने नहीं किया हो।

ओएनजीसी ने दिया एडवेंचर्स का मौका
सइंस से गे्रजुएशन करने के बाद डा. डबराल ने स्नातकोत्तर के लिए आट्र्स चुना। उनकी भूविज्ञान में रुचि थी, इसके कारण उन्होंने एमए भूविज्ञान में किया। इसके बाद वर्ष 1985 में उन्हें ओएनजीसी में नौकरी मिल गई। ओएनजीसी ने एडवेंचर्स के लिए उन्हें मौका दिया और उन्होंने अपने कठोर अनुशासन और कुशल नेतृत्व के माध्यम से ओएनजीसी की टीम का विभिन्न एक्सपिडिशन में नेतृत्व किया और फतह भी हासिल की।

कई चोटियों पर पायी जीत
पर्वतारोहण की बात पर डा. डबराल के चेहरे पर आज भी विजयी मुस्कान तैर जाती है। वह बताते हैं कि ओएनजीसी का जो इन दिनों मिशन एवरेस्ट चल रहा है, उसकी सोच ओएनजीसी के कारपोरेट इंफ्रास्ट्रक्चर के कंट्री हेड श्री हर्षमणि व्यास की थी और अमल मैंने किया। वह ओएनजीसी टीम के इस महत्वाकांक्षी अभियान को लेकर उत्साहित हैं लेकिन उनका मानना है कि टीम को अधिक कठिन परिश्रम और चुनौतियों का सामना करना होगा, क्योंकि अभियान सबसे बड़ा और विषम है। वह इस टीम के कुछ सदस्यों को मिशन एवरेस्ट पूरा करने के लिए सक्षम मानते हैं बशर्ते वो अनुशासित रहें और टीम भावना से काम करें। डा. डबराल वर्ष 2015 के दौरान एवरेस्ट बेस कैंप करने वाली ओएनजीसी टीम के डिप्टी लीडर भी रहे। डा. डबराल ने 25,446 फीट ऊंचाई वाले कामेट पर्वत पर जीत हासिल की। इसके अलावा उन्होंने 23,392 फीट ऊंची अभिगामिन चोटी,18,515 फीट पर स्थित भनोटी चोटी पर भी वर्ष 2003 में फतह हासिल कर ली थी। उन्होंने दो नई चोटियों पर भी फतह की। इनमें टेंट चोटी जो कि 18600 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और कार्नर पीक जो कि 20172 फीट ऊंची है।

कदम-कदम पर चुनौतियां
डा. डबराल बताते हैं कि उन्हें जीवन में हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा है, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वह बताते हैं कि कामेट पर चढ़ाई के लिए ओएनजीसी ने उन्हें स्पांसर किया था, लेकिन जिस टीम के साथ थे उन्होंने मेेरे साथ स्वास्थ्य का बहाना कर मुझे एक्सपिडिशन से बाहर करना चाहा। जबकि मैं उनकी टीम के सदस्यों से कहीं बेहतर स्वस्थ था। उस दौरान मेरी उम्र 43 वर्ष थी जबकि अन्य सदस्य 30 से 35 साल के थे। लेकिन मैं ठान चुका था कि इस अभियान को बीच में नहीं छोडंूगा। उस अभियान को सेना की एक टीम भी कर रही थी। उस टीम ने मुझे अपने साथ ले लिया और तेजी से चोटी पर चढ़ने लगा। वह हंसते हुए बताते हैं कि जब चोटी पर फतह करने में महज 100 फीट बचे थे तो मेरी टीम ने मुझे अपने साथ मिला लिया। वह बताते हैं कि कठोर अनुशासन व दृढ़ निश्चय से ही पर्वतारोहण किया जा सकता है। अपने कठोर अनुशासन के कारण उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है। इसके बावजूद वह अपने इरादों से नहीं हटे।

लाहौल-स्पीति पर की पीएचडी
डा. डबराल बताते हैं कि उन्होंने जब भूगोल में पीएचडी करने की सोची तो तय किया कि कुछ अलग करना है। वह किन्नौर पर रिसर्च करना चाहते थे, लेकिन उनके गाइड ने कहा कि यदि अलग करना है तो लाहौल-स्पीति पर रिसर्च करो, इस पर किसी ने अब तक पीएचडी पूरी नहीं की है। मैंने गाइड की बात मान ली। पंजाब यूनिवर्सिटी से पीएचडी की तैयारी कर दी। लेकिन 12500 फीट की ऊंचाई पर स्थित लाहौल-स्पीति पर पीएचडी करना एक बड़ी चुनौती थी। वहां साल के नौ महीने तो बर्फ रहती है। तीन महीने ही वहां जाया जा सकता था। इसमें भी कहीं बर्फ से लकदक रास्ते, कहीं दलदल तो कहीं नाले। रिसर्च के दौरान कई बार जान जोखिम में डाली। तापमान भी शून्य से कहीं नीचे। पीएचडी में सात साल लग गये। वाइवा के लिए लंदन से कोई लेडी प्रोफेसर आयी तो उसने रिसर्च पेपर पर जो टिप्पणी लिखी, पंजाब विवि के क्लर्क उसे ठीक से समझ नहीं सके और उन्होंने लिखा कि रिसर्च पेपर रिजेक्ट हो गए। मैं निराशा के भंवर में डूब गया। वर्षों की मेहनत का यह सिला। इस बीच मेरे गाइड ने रिसर्च पेपर पर वह टिप्पणी पढ़ी तो खुश हो गये। उन्होंने मुझे बताया कि थीसिस को अतुलनीय कहा गया है। इस तरह से मुझे पीएचडी की डिग्री हासिल हुई। 

सीखने का रहा हमेषा जज्बा
डा. डबराल को सीखन की ललक रही है। ओएनजीसी की नौकरी हासिल करने के बाद यह ललक और बढ़ी। वह हिंदी और अंग्रेजी के अलावा उर्दू और पंजाबी भाषाओं को भी लिख-पढ़ लेते हैं। उन्होंने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से उर्दू में सर्टिफिकेट हासिल किया तो पंजाब यूनिवर्सिटी से पापुलेशन एजुकेशन में डिप्लोमा हासिल किया। इसके अलावा उन्होंने आईस स्केटिंग, वाटर स्केटिंग, पैरा सेलिंग, ग्लाइडिंग कोर्स भी किये। वर्ष 1998 में दार्जिलिंग के हिमालय माउंटेनरिंग इंस्टीट्यट से पर्वतारोहण में बेसिक कोर्स किया तो इसके एक साल बाद एडवांस।
उनके कई रिसर्च पेपर भी प्रकाशित हुए हैं। इनमें लाहौल-स्पीति की जनजाति की साक्षरता के बारे में उनका व एस राम का एक लेकख ज्योग्राफिकल रिव्यू आॅफ इंडिया में वर्ष 1994 में प्रकाशित हुआ। इसके एक साल बाद उनका दूसरा पेपर भी लाहौल-स्पीति के संदर्भ को लेकर उत्तर भारत में रहने वाली जनजातियों की आबादी में बढ़ोत्तरी को लेकर प्रकाशित हुई। इसके अलावा भी उनके कई शोध व लेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित किए गये। 


घर को बना लिया रिसर्च केंद्र
डा. डबराल ने अपने घर में विभिन्न प्रजातियों के डेढ़ सौ से भी अधिक पौधे लगाए हैं। यह पौधे वह पहाड़ के वातावरण के अनुकूल देश के विभिन्न इलाकों से लाते हैं। वह पहले इनको अपने घर में बने बगीचे में उगाते हैं, यदि उन्हें इसमें सफलता मिलती है तो अन्य किसानों को पौधे उपलब्ध करा देते हैं। वह बताते हैं कि कुछ पौधे व जड़ी-बूटियां पहाड़ में रोजगार का साधन बन सकते हैं। 

डा. डबराल को मिले पुरस्कार
-वर्ष 2014 में भारत ज्योति पुरस्कार
-वर्ष 2002 में ओएनजीसी हिमालयन एसोसिएशन पुरस्कार
-ओएनजीसी ने कई बार उनको साहसिक कार्यों व पर्वतारोहण के लिए सम्मानित किया
अन्य गतिविधियों में भी रहे सक्रिय
-वर्ष 1998-2000 ओएनजीसी हिमालयन एसोसिएशन का संयुक्त सचिव
-वर्ष 2007-10 सचिव, ओएनजीसी हिमालयन एसोसिएशन
-वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के समय ओंगछा के डिजास्टर सर्वे का टीम लीडर। इस टीम ने आपदा प्रभावितों की मदद की
मोथरावाला में भी मिली चुनौती
डा. डबराल को मोथरावाला में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने चार साल तक नगर पालिका के खिलाफ ग्रामीणों के साथ मिलकर संघर्ष किया, क्योंकि पालिका केदारपुरम में डपिंग जोन बनाना चाहती थी। वह कहते हैं कि उन्होंने जीवन भर की जमा-पंूजी यहां मकान बनाने में खर्च की तो इसे व्यर्थ कैसे जाने देता। इसी तरह स ेअब बाईपास का मामला भी है। वह यहां बाइपास बनाने का विरोध कर रहे हैं। उनके अनुसार सरकार के पास कोई पूर्व निर्धारित योजना नही है। ऐसे में उनके बसे-बसाए घर उजाड़ना कैसी नीति? डा. डबराल ने इस शांत इलाके में साजिश के तहत चार लाउडस्पीकर लगाने के षडयंत्र के खिलाफ भी ग्रामीणों को लामबंद किया।
डबरालस्यूं में सामूहिक खेती की पहल
डा. डबराल बताते हैं कि डबराल परिवारों ने गांव बसाने की कवायद शुरू की है। इसके तहत कई गांवों ने पानी की बहुतायत वाली 80 नाली जमीन को सामूहिक खेती के लिए लिया है। इसमें कैश क्राप की जाएगी। यह पहल है यदि योजना सफल रही तो खेती का विस्तार किया जाएगा। उनका मानना है कि पहाड़ को बसाना हम सबकी जिम्मेदारी है। इसे मात्र सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता।

साभार : उत्तरजन टुडे

 

पहाड़ के युवाओ के लिए लाइफ लाइन तयार कर रहे है कर्नल डिमरी 

रुद्रप्रयाग में युवाओं के लिए सेण्टर फॉर एक्सीलेंस तैया

 

दून स्थित घंटाघर का काफी कैफे डे। छरहरे बदन का एक लंबा-पतला व्यक्ति हाथ में फाइल लिए हुए था। आंखों में चश्मा, चुस्त-दुरस्त। उम्र का अंदाजा लगाना कठिन था। कैफे डे की कार्नर टेबल पर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो पता चला कि यह शख्स सातवें दशक के शुरुआत में है। हैरत थी कि उम्र के इस पड़ाव में आज भी युवाओं जितनी फुरती और सोच कहीं अधिक। यह व्यक्ति पहाड़ के विकास की पीड़ा को लेकर इन दिनों ऐसे लोगों की तलाश कर रहा है जो राजनीति में शुचिता लाने के लिए दृढ़ संकल्पित हों। स्वच्छ छवि और धरातल पर काम करने वाले लोगों की तलाश करना ठीक ऐसे है जैसे भूसे के ढेर में सुई तलाशना। पर एक बेहतर प्रदेश की परिकल्पना को धरातल पर उतारने के लिए वह शख्स इस मुहिम के प्रति गंभीर है। कभी सेना के लिए संचार (सिग्नल) तैयार करने वाला यह व्यक्ति आज पहाड़ के युवाओं के लिए भी लाइफ लाइन जुटा रहा है।
यह कहानी कर्नल डीपी डिमरी की है।सिग्नल कोर में तैनात रहे कर्नल डिमरी उत्तराखण्ड के भविष्य के लिए चिन्तित है। वह पहाड़ से पलायन रोकने की दिशा में काम कर रहे है। उनका मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रो के युवाओं का स्किल डेवलप किया जाए तो पलायन तो रूकेगा ही साथ ही प्रदेश की आर्थिकी भी कहीं अधिक मजबूत होगी। 


टेक्नोक्रेट देव में रही सीखने की ललक 
रूद्रप्रयाग जिले के सेम गांव निवासी कर्नल डिमरी में आत्मविश्वास व कुछ कर गुजरने की ललक बचपन से ही रही। उनके पिता पटवारी थे। दो बहनें व तीन भाई हैं। उनका बचपन दून के पथरी बाग में बीता। पढ़ाई लक्ष्मण विद्यालय से की। वर्ष 1966 में उन्होंने एमएससी फिजिक्स में किया। रोजगार के मामले में उनकी किस्मत गजब की थी। 30 जून को उन्होंने एमएससी किया और दस जुलाई को वह मसूरी डिग्री कालेज में लेक्चरार बन गये। पढ़ाई में वह शुरू से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। महंत इंद्रेश उनसे इतने अधिक प्रभावित थे कि उन्हें पढ़ने के लिए दरबार साहिब में अलग से रूम दिया था। वह हंसते हुए बताते हंै कि जब उन्होंने मसूरी डिग्री कालेज की नौकरी की तो महंत नाराज हुए कि उनके यहां क्यों नहीं लेक्चरार बने।

आईएएस बनना चाहते थे बन गये फौजी
 कर्नल डिमरी के अनुसार वह आईएएस बनना चाहते थे और इसके लिए तैयारी कर रहे थे। लिखित परीक्षा पास भी कर ली थी लेकिन इंटरव्यू में रह गए। इस बीच वर्ष 1979 में उन्हें सेना में जाने का अवसर मिला और वह ओटीए पहुंच गए। उन्हें कोर आॅफ सिग्नल में कमीशन मिला। कमीशन मिलने के दो माह बाद ही उन्हें 1971 की लड़ाई में भेज दिया गया। उस समय वह कैप्टन थे और मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी(तब ले. कर्नल) के साथ मोर्चे पर तैनाथ थे। कर्नल डिमरी बताते हैं कि जनरल खंडूड़ी रोज शाम को हम दो अफसरों को अपने पास बुलाते थे। 

सेना में रहते हुए किया एमटेक और एमबीए
सेना में कर्नल डिमरी ने कई अहम कार्य किए। मोबाइल नेटवर्क का सर्वे भी इसमें शुमार है। उन्होंने भूटान में भी ढाई साल गुजारे। सेवा के दौरान उनकी सीखने की ललक बनी रही और उन्होंने एमटेक और एमबीए भी किया। सेवा से रिटायर होने के बाद उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से कारपोरेट एचआर में पीएचडी की। 26 साल देश सेवा के बाद वह सेवानिर्वत्त हो गये।

निजी क्षेत्र में कई अहम पदों पर काम
सेना से रिटायर होते ही उन्हें तुरंत ही एयरटेल में वाइस प्रेसीडेंट की पोस्ट मिल गई थी। इसके बाद वर्ष 1998 में ट्रापीकाना टेलीकाॅम में उन्हें फाउंडर सीईओ का चुनौती भरा जाॅब मिला, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा और योग्यता के दम पर बखूबी निभाया। इस दौरान उन्होंने विदेशों की यात्रा की और वहां की मोबाइल तकनीकों को समझा। यह कंपनी प्रख्यात उद्यमी जेआर देसाई की थी। उन्होंने छह साल तक इस कंपनी के सीईओ पद पर काम किया। उन्होंने कंपनी को जीरो से 46 करोड़ तक का बना दिया। वर्ष 2004 में वे तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की महत्वाकांक्षी परियोजना इंडियन सोसायटी फाॅर ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट (आईएसटीडी) से भी जुड़े। इसके तहत देश में स्किल डेवलपमेंट किया जाना था। इस दौरान वह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन से भी जुड़े रहे। 

टेक्सटाइल मिनिस्ट्री में एडवाइजर
कर्नल डिमरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के द्वितीय कार्यकाल के दौरान कपड़ा मंत्रालय में सलाहकार चुना गया। उन्हें देशभर में स्किल डेवलेपमेंट और प्रशिक्षण के लिए 125 सेंटर बनाने की जिम्मेदारी मिली। दो साल की अवधि में ही ये संेटर खोले जाने थे। इसके तहत उन्होंने देशभर का दौरा किया और सेंटर के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सेंटर के लिए जमीन मांगी। राज्यों को महज जमीन उपलब्ध करानी थी, जबकि सारा खर्च केंद्र को उठाना था। 

क्या है नवीन व निशंक में अंतर
कर्नल डिमरी बताते हैं कि जब वह स्किल डेवलपमेंट एंड टेªनिंग सेंटर के बारे में उड़ीसा गए तो तय किया गया था कि वह उस राज्य को दस सेंटर देंगे। जब वह उड़ीसा के चीफ सेक्रेट्री के साथ इस संबंध में बात कर रहे थे तो तत्कालीन सीएम नवीन पटनायक चीफ सेके्रट्री के कक्ष में स्वयं ही आ गए और योजना के बारे में जानने लगे। जब मैंने उन्हें प्रेजेंटेशन दी और यह बताया कि दस सेंटर उड़ीसा को देने हैं तो वह जिद करने लगे कि इतना बड़ा प्रदेश है। यहां बीस सेंटर खोलें। उन्होंने कहा िकवह टेक्सटाइल मिनिस्टर से बात कर सकते हैं। उन्होंने इस प्रोजेक्ट में जबरदस्त रुचि ली। मैंने कहा कि मिनिस्टर साहब भी मुझे ही कहेंगे। आखिरकार मैंने दो सेंटर यानी उड़ीसा 12 सेंटर बनाने पर सहमति दे दी। इसके विपरीत जब वह उत्तराखंड आए, तो तत्कालीन सीएम रमेश पोखरियाल निशंक थे। निशंक ने अधिकारियों से कहा कि कर्नल साहब बहुत अच्छा प्रोजेक्ट लाए हैं। मैंने तीन सेंटर-एक पिथौरागढ़, एक देहरादून व एक अगस्त्यमुनि में खोलने का प्रस्ताव रखा। योजना की सराहना तो हुई पर जमीन आज तक नहीं मिली। न तो निशंक सरकार और न ही अन्य सरकारों ने इसमें रुचि ली। इस संबंध में वह सितंबर 14 में सीएम रावत से भी मिले थे, सेंटरों का क्या हुआ, पता नहीं।
 
पहाड़ के लिए धड़कता है दिल 
पर्वतीय जिलों से पलायन को लेकर कर्नल डिमरी बहुत चिंतित हैं। उन्होंने यहां के युवाओं की पीड़ा को समझा और इस दिशा में धरातल पर काम करना शुरू किया। वह बताते हैं कि सेना में रहते हुए उन्होंने समाज सेवा करनी शुरू कर दी थी। उन्होंने अपने गांव के स्कूल में स्कालरशिप की शुरुआत की थी। स्कूल में लाइब्रेरी बनवाई। वह दिल्ली की प्रसिद्ध उत्तरायणी संस्था से भी जुड़े हैं। उत्तरायणी उत्तराखंड के अफसरों की संस्था है। इस संस्था का अध्यक्ष आईएएस अधिकारी ही होता है लेकिन मैं इस संस्था का पांच साल अध्यक्ष रहा। वह बताते हैं कि उत्तरायणी संस्था ने केदारनाथ आपदा के बाद वहां के ग्रामीणों की मदद करने का फैसला किया। इसके तहत इंडियन आयल से बात की गई। इंडियन आयल ने एक करोड़ 35 लाख रुपये का फंड आपदा प्रभावितों के लिए तय किया। इसके तहत एक गांव को गोद लिया जाना था। इंडियन आयल और उत्तरायणी की टीम ने गांव का दौरा किया। इस टीम की अगुवाई मैं कर रहा था। जब हम उखीमठ ब्लाक के गांवों का दौरा कर वापस लौट रहे थे तत्कालीन डीएम ने मुझसे कहा कि गांव तो कई संस्थाएं गोद ले रही हैं लेकिन कुछ ऐसा किया जाए कि यहां के युवाओं की हालत सुधरे। उनके अनुसार वह अपनी माटी का कर्ज चुका रहे हैं। 

रुद्रप्रयाग सेंटर फाॅर एक्सीलेंस की तैयारी
वापस लौट कर हमने विचार किया और तय किया कि रुद्रप्रयाग में युवाओं के लिए सेंटर फाॅर एक्सीलेंस बनाया जाएगा। इसमें पहाड़ के युवाओं को रोजगार संबंधी जानकारी व ट्रेनिंग दी जाएगी। कर्नल डिमरी के अनुसार पहाड़ के अधिकांश युवाओं को जानकारी नहीं मिलती कि सेना में भर्ती कब है या एनडीए या डीडीएस के फार्म कब निकलते हैं। आईएएस की तैयारी तो दूर की बात है। अब इस सेंटर में सिपाही और क्लर्क से लेकर अफसर और आईएएस की तैयारी की जाएंगी। यह सेंटर तीन मंजिला बनकर तैयार हो गया है। इस सेंटर के लिए डायरेक्टर की तलाश चल रही है। उम्मीद है कि जल्द ही यहां ट्रेनिंग देने का काम शुरू हो जाएगा। 
हाॅस्टल के लिए ओएनजीसी ने बढ़ाए मदद को हाथ
कर्नल डिमरी के अनुसार चंूकि यहां प्रदेश भर के युवा प्रशिक्षण व पढ़ने के लिए आएंगे तो हाॅस्टल भी चाहिए था। रुद्रप्रयाग के डीएम ने हाॅस्टल के लिए जमीन उपलब्ध करा दी है। हाॅस्टल के लिए हमने ओएनजीसी से बात की और वह इसके निर्माण कार्य के लिए धनराशि जारी करने को राजी हो गया। ओएनजीसी ने हाॅस्टल के लिए 97 लाख रुपये दिए हैं। 
एयरपोर्ट अथारिटी भी मददगार 
पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं को रोजगार दिलाने की दिशा में एयरपोर्ट अथारिटी ने भी मदद को हाथ बढ़ाया। अथारिटी ने 100 युवाओं को प्रशिक्षण के लिए 29 लाख रुपये दिए हैं। यानी हर युवा के लिए 29 हजार रुपये। इसके लिए हापुड़ के एक संस्थान के साथ करार किया है। यह धनराशि संस्थान को प्रशिक्षण के लिए युवाओं को आने-जाने व वहां रहने के खर्च के तौर पर दिया जाता है। प्रशिक्षण फ्री है। आटोमोबाइल सेक्टर में भी गुड़गांव के मारुति और अशोक लेलैंड में नौकरी दी जाती है। 

उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर
कर्नल डिमरी बताते हैं कि उत्तराखंड में उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में भी वह काम कर रहे हैं। इसके तहत हम ग्रामीणों को सामूहिक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसके तहत आशिंक चकबंदी की जा रही है। सात गांवों में यह योजना लागू की जा रही है। इसमें जैविक उत्पादों की खेती की जाएगी और इसकी बिक्री केंद्रीय भंडारों के माध्यम से की जाएगी। 
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बदहाली के लिए भाजपा-कांग्रेस जिम्मेदार
कर्नल डिमरी मानते हैं कि उत्तराखंड की बदहाली और पलायन के लिए भाजपा और कांग्रेस नीत सरकारें जिम्मेदार रही हैं। यहां के नेताओं ने राज्य हित से कहीं अधिक निजी स्वार्थ को तवज्जो दी। यही कारण रहा कि पर्वतीय क्षेत्र व सीमांत गांव आज भी विकास से अछूते हैं और ग्रामीण शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। नेताओं में इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता का अभाव है, ऊपर से अधिकांश नेता भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबे हुए हैं। चंूकि जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है इसलिए जनता बारी-बारी से भाजपा-कांग्रेस को ही चुनती है। कर्नल डिमरी के अनुसार वह और प्रदेश के कई बुद्धिजीवी नये विकल्प व नये राजनीतिक चेहरों की तलाश कर रहे हैं ताकि राजनीति में शुचिता को लाया जा सके। इस दिशा में काम किया जा रहा है। क्षेत्रीय दलों को भी संगठित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। हमारा प्रयास है कि निष्कलंक और साफ छवि के लोगों को राजनीति में आगे लाया जाए। इसके लिए एक अपैक्स बाडी तैयार की जा रही है। इसमें बुद्धिजीवी लोगों को जोड़ा जाएगा। इसके बाद भावी रणनीति तैयार की जाएगी।

 

साभार :उत्तरजन टुडे

 

                                                                                                                                                                                                   चेहरे पर एक विजेता सी मुस्कान और शब्द-शब्द में टपकता आत्मविश्वास, मन में पहाड़ के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना। नीली जींस और हल्की मैरून कलर की शर्ट पहने वह सादगी प्रतिमूर्ति लगे, ऐसे में कोई भी सहसा विश्वास नहीं कर सकता है िकवह व्यक्ति कभी देश के सबसे बड़े उद्यमी मुकेश अंबानी का बेहद नजदीक रहा हो और उसकी एक कंपनी का सीनियर वाइस प्रेजीडेंट। रिलायंस गैस ट्रांसपोर्टेशन इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड में सीनियर वाइस प्रेजीडेंट रहे सुधीर बहुगुणा ने ओएनजीसी विदेश को भी नया आयाम देने में अहम भूमिका अदा की। यह उनका पहाड़ प्रेम ही था कि वह रिलायंस की नौकरी को छोड़ कर अपना निजी व्यवसाय कर रहे हैं। वेदांग कंसलटेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की सीईओ एंड एमडी सुधीर बहुगुणा ने महज चार वर्ष के दौरान ही देश में अपनी अलग पहचान बना ली है। इस कंपनी की आय का 20 प्रतिशत भाग वह पहाड़ के विकास पर खर्च कर रहे हैं। 
सुधीर बहुगुणा मूल रूप से टिहरी गढ़वाल के साकली गांव के निवासी हैंै। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पहाड़ के ही विभिन्न इलाकों में हुई। वह बचपन से ही पढ़ने में कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने वर्ष 1983 में दिल्ली के आईईटी से इलेक्ट्रानिक्स एंड टेलीकाॅम में इंजीनियरिंग की। इसके बाद उनका ओएनजीसी में नौकरी मिल गई।

वंडर्स आफॅ 20 पीपल्स

वर्ष 1997 में ओएनजीसी विदेश ने कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों में से 20 सर्वश्रेष्ठ लोगों को अपने साथ जोड़ा। उस समय ओएनजीसी विदेश करोड़ों के घाटे में चल रही थी। इन बीस कर्मचारियों की टीम में सुधीर बहुगुणा का चयन भी किया गया था। इस वंडर टीम ने ओएनजीसी विदेश की दशा और दिशा बदल दी। टीम ने एक दशक की अवधि में ही ओएनजीसी विदेश को 1500 करोड़ प्राफिट की कंपनी बना दिया। ओएनजीसी विदेश के तहत सुधीर बहुगुणा ने यूएसए, सूडान, सिंगापुर आदि देशों में काम बखूबी संभाला। बहुगुणा कंपनी के आईटी सेक्टर के मोर्चे पर काम करते थे। और उन्होंने आयल सेटअप के साफ्टवेयर तैयार किए। विदेश में रहते हुए सुधीर ने यूएसए के एक्साॅन मोबाइल, बीपी, सीएनपीसी, पेट्रो वियतनाम के साथ आईटी, आर्गनाइजेशन चेंज्ड मैनेजमेंट और बिजनेस ट्रांसफार्मेशन प्रोजेक्ट्स पर काम किया। वह वर्ष 2002 से यूएसए के गेरसन लेहरमन कंसल्टिंग गु्रप के काउंसिल मेम्बर भी हैं। यह सुधीर बहुगुणा समेत 20 कार्यकुशल वंडर टीम की अथक मेहनत और दूरदर्शिता है कि ओएनजीसी विदेश मौजूदा समय में 17 देशों में 37 प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। 

रिलायंस इंडस्ट्रीज से नाता
ओएनजीसी विदेश में अपनी क्षमता और योग्यता का लोहा मनवाने के बाद सुधीर ने वर्ष 2006 में देश के प्रख्यात उद्यमी मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज में नाता जोड़ लिया। अंबानी ने उनकी प्रतिभा और कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें रिलायंस गैस ट्रांसपोर्टेशन इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड में वाइस प्रेसीडेंट और फिर सीनियर वाइस प्रेजीडेंट की अहम जिम्मेदारी दी। इस कंपनी में आॅयल एंड गैसे संबंधित सभी अहम फैसले लेते थे। रिलायंस में भी उन्होंने नये कंसेप्ट के साथ आॅयल एंड गैस के लिए वेल हेड टू कस्टमर, आईटी और आॅटोमेशन इंफ्रास्ट्रक्चर का विश्व स्तरीय साॅफ्टवेयर तैयार किया। उन्होंने कंपनी के लिए अगले 25 वर्षों के लिए आईटी सेटअप तैयार किया। इस सेटअप के माध्यम से आॅपरेशनल कास्ट में भी कमी आयी। रिलायंस इंडस्ट्रीज में अपने लगभग पांच साल के सफर में उन्होंने कई आयाम स्थापित किए। लेकिन कुछ समय के बाद उन्हें महसूस हुआ कि अब कुछ और नया करना चाहिए। जिसका लाभ आम जनता को भी मिले। यही सोचकर उन्होंने रिलायंस से इस्तीफा दे दिया। सुधीर बताते हैं कि स्वयं मुकेश अंबानी ने उन्हें कहा कि यदि वह दिल्ली में रहना चाहते हैं तो टेलीकाॅम संभाल लो, लेकिन मैं तय कर चुका था कि अब कुछ अपना ही काम करना है। 


वेदांग कंसल्टेंसी की स्थापना
रिलायंस छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू करने का फैसला कठिन था। सुधीर बताते हैं कि इस फैसले में उनकी पत्नी गार्गी बहुगुणा ने हर बार की तरह मेरा पूरा साथ दिया। वर्ष 2012 में रिलायंस से इस्तीफा देने के बाद मैंने वेदांग कंसलटेंसी प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की। इस कंपनी में मेरा उद्देश्य था कि सरकार के लिए ई गवर्नेंस सेवा देना। मैंन महसूस किया है कि अधिकांश सरकारों के पास प्रोजेक्ट्स को लेकर कोई वीजन नहीं है। इस कारण ई-गवर्नेंस को अधिक प्रभावशाली नहीं बनाया जा सका। सुधीर बहुगुणा के अनुसार हमने तय कि जोखिमह म लेंगे और साॅफ्टवेयर तैयार करेंगे। इस क्रम के तहत हमने उत्तराखंड सरकार से बात की और काम की शुरूआत हो गई। मैंन सिडकुल हरिद्वार से शुरुआत की। इसके तहत पेपरलेस वर्क को प्रोत्साहन मिला। सिडकुल को जीपीएफ के तहत जोड़ा गया। आज स्थिति यह है कि उत्तराखं डमें सिडकुल का साफ्टवेयर तैयार है और एक क्लिक करते ही सिडकुल की भूमि, प्लाट, रेट, फैक्टरी आदि के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है। वह बताते हैं कि आज सरकार इज आॅफ डूइंग पर कार्य कर रही है। जबकि इस कंसेप्ट के तहत उन्होंने सिडकुल की फेजिंग की। वह बताते हैं कि रिकार्ड चार माह के समय में ही सिडकुल की फेजिंग कर दी। 
स्मार्ट सिटी के बारे में उन्होंने बताया कि इसका उद्देश्य सरकार और जनता के बीच में पुल की तरह से काम करना है। डायनमिक रिस्पांस के तहत लोगों को बेहतरीन बुनियादी सुविधाएं जैसे, बिजली-पानी, सड़क, स्वास्थ्य, ट्रांसपोर्टेशन, सिक्योरिटी आदि उपलब्ध करानी हैं। आईटी के माध्यम से लोगों की समस्याओं का निपटारा करना है। 


एक क्लिक पर ग्रेटर नोयडा की जानकारी
वेदांग कंसल्टेंसी ने गे्रटर नोयडा को पूरी तरह से आन लाइन कर दिया है। ग्रेटर नोयडा इंडस्ट्रियल डेवलेपमेंट अथारिटी के किसी भी प्लांट या जगह की जानकारी अब आपको घर बैठे मिल जाएगी। पहले ग्रेटर नोयडा में जमीन को लेकर भारी भारी घपले और धोखाधड़ी हो रही थी लेकिन इस साॅफ्टवेयर ने यहां की इस तरह की समस्त समस्याओं का समाधान कर दिया है। अब खसरा नंबर या प्लाट नंबर के आधार पर उसकी समस्त जानकारी मिल जाती है। इसका श्रेय सुधीर बहुगुणा को ही जाता है। उनकी टीम ने रिकार्ड 43 दिनों में ही पूरा ग्रेटर नोयडा क्षेत्र को स्मार्ट आईई और ईआरपी सिस्टम से आॅनलाइन कर दिया। उनके अनुसार इस साफ्टवेयर के माध्यम से पेपरलेस और केशलेस सुविधा मुहैया हो गई है। उनकी कंपनी इस दिनों तेलंगाना सरकार के लिए भी साॅफ्टवेयर तैयार कर रही है। इंरप्राइसेज रिसोर्सेज प्लानिंग यानी ईआरपी के तहत 101 लोकशन तलाशे गए हैं। 
उनके अनुसार अपनी कंपनी शुरू करने का उद्देश्य था कि रोजगार सृजित किया जाए और बेहतरीन सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी साफ्टवेयर तैयार किए जाएं जो कि सस्ता और प्रभावी हो। इस कड़ी में कंपनी ने अब तक आईटी और आॅयल एंड गैस के लिए 24 साफ्टवेयर तैयार किए हैं जिनमें से 13 प्रभावी हो गए हैं। 
स्मार्ट वाटर ग्रिड का साॅफ्टवेयर कर रहे तैयार
सुधीर बताते हैं कि उनकी कंपनी स्मार्ट वाटर ग्रिड को तैयार कर रही है। उनके अनुसार पानी दिनोंदिन पूरे विश्व के लिए समस्या है। पानी के लिए तीसरा विश्वयुद्ध होगा। उनका मानना है कि पानी के वितरण में 60 प्रतिशत पानी का उपयोग नहीं हो पाता है। वाटर लाॅस का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है। स्मार्ट वाटर ग्रिड प्रणाली से हम पानी की आपूर्ति में होने वाले नुकसान को कम से कम कर सकते हैं। इस प्रणाली के तहत पानी के स्रोत से लेकर उसकी आपूर्ति तक पूरी प्रक्रिया को आनलाइन किया जा सकेगा। वेदांग कंसल्टेंसी तीन एम यानी मैन पावर, मटेरियल, और मनी का सही उपयोग कर टेक्नोलाजी को अफोर्डेबल व ट्रांसपरेंट बनाने का काम कर रही है। 

देहरादून बन सकता है आईटी हब
टैक्नोक्रेट सुधीर बहुगुणा मानते हैं कि देहरादून आईटी हब बन सकता है। उनके अनुसार वह लंबे समय से इसके लिए प्रयास रत रहे हैं। उनका कहना है कि मैं प्रदेश के हर मुख्यमंत्री से मिला, मैंने इस संबंध में बात भी की लेकिन कोई सकारात्मक पहल नहीं हो सकी। वह बताते हैं कि यदि सरकार प्रोत्साहन दे और आईटी कंपनियों को सब्सिडी दे तो देहरादून दिल्ली एनसीआर के मुकाबले में आईटी के लिए सबसे अच्छा है। वह मानते हैं कि देहरादून का वातावरण और यहां की लिविंग कास्ट कम है। यहां शिक्षा का भी हब है। ऐसे में आईटी कंपनियों को मैनपावर अच्छी भी मिलेगी और सस्ती भी। पर किसी भी सरकार ने उनके सुझाव पर सकारात्मक पहल नहीं की। 
पांच लड़कियों को स्पांसरषिप 
सुधीर अपनी माटी की जड़ों से जुड़े हुए हैं। विदेशों में रहते हुए भी उनका अपनी माटी से जुड़ाव रहा। उनका दिल पहाड़ के लिए धड़कता है यही कारण है िकवह पहाड़ के विकास को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने तय किया है कि उत्तराखंड की पांच प्रतिभावान लड़कियों को पढ़ाई के साथ ही हास्टल व अन्य खर्चे भी वह उठाएंगे। ये लड़कियां भले ही डाक्टरियां करें या इंजीनियरिंग या किसी अन्य कोर्स में। वह बताते हैं कि इनल ड़कियों के चयन का आधार तय किया जा रहा है। यह व्यवस्था उनके ट्रस्ट श्रीनंद रिखली वेदांत के माध्यम से दी जाएगी। सुधीर अपनी आय का 20 प्रतिशत इस ट्रस्ट को दे रहे हैं। 

दादी से मिले संस्कार
सुधीर बहुगुणा पांच भाई हैं। वह उनकी एक बहिन है। सुधीर को समाज सेवा के संस्कार विरासत में मिले हैं। उनकी दादी रिखली देवी के विचारों का उनके जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। सुधीर के अनुसार जब वह छोटे थे, तो दादी ने उनके पिता हो कहा था कि इसे मेरे साथ गांव में रहने दो। तब कुछ महीनों के लिए मैं दादी के साथ गांव में रहा। इस दौरान उन्होंने मुझे जो सीख दी, उसका असर बना हुआ है। गांव से नाता लगातार जुड़ा रहा। मैं अपनी बेटी रुनझुन को भी हर साल गांव ले जाता हूं। मेरे बड़े भाई विनोद बहुगुणा फारेस्ट में डीजी रहे हैं। और अब उत्तराखंड रक्षा मोर्चा के अध्यक्ष हैं। भाई से भी हमें संस्कार और जीवन में कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिली है। मेरी पत्नी गार्गी एडवोकेट है। और गरीबों को मुफ्त में कानूनी सलाह देती है। सुधीर दिल्ली वसंतकुंज रोटरी क्लब के अध्यक्ष भी हैं।

साभार: उत्तरजन टुडे