बुलंद हौसलों से चढ़ा चुनौतियों का पहाड़ डा. बीएम डबराल

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Published: 08 February 2017
112 times Last modified on Saturday, 11 February 2017 08:02
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ओएनजीसी में टिप्टी मैनेजर हैं डा. बीएम डबराल
-पर्वतारोहण के 30 से भी अधिक अभियान सफलतापूर्वक किए हैं पूरे
-पहाड़ के हितों के लिए कर रहे हैं कार्य

देहरादून का मोथरावाला। यहां के एक पहाड़ीनुमा दो मंजिले मकान के गेट पर पहुंचता हूं। यह भवन डा. बृजमोहन डबराल का है। गेट पार करते ही भवन परिसर में चारों ओर हरियाली नजर आती है। एक छोटा सा तालाब जिसमें कमल की विभिन्न प्रजातियां तैर रही हैं। परिसर में डेढ़ सौ से भी अधिक प्रजातियों के पेड़-पौधे। यहां प्रकृति मुस्करा रही थी और साथ में डा. डबराल भी। छरहरे बदन और विनम्र स्वभाव के डा. डबराल बुलंद इरादों के स्वामी हैं। वह जो ठान लेते हैं कर गुजरते हैं। वो अनुशाशित हैं और पहाड़ की तरह अडिग। 
डा. डबराल ओएनजीसी देहरादून में डिप्टी मैनेजर के तौर पर कार्यरत हैं। उनके हौसलों व कुछ कर गुजरने की हसरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 43 वर्ष की आयु में भी कामेट जैसी विषम चोटी पर फतह हासिल कर ली। वह ओएनजीसी के पर्वतारोहण और टेªकिंग के 30 से भी अधिक अभियानों के लीडर रहे हैं।

दादा जी बने प्रेरणास्रोत
डा. डबराल का जन्म पौड़ी गढ़वाल के डबरालस्यूं पट्टी के डबोली गांव में हुआ। पिता सरकारी नौकरी में थे। दो भाई और दो बहन हैं। दादा जी श्री भोला दत्त डबराल स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका गढ़वाल में बड़ा नाम था। उनके आदर्श व देशभक्ति से डा. बृजमोहन के जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। वह चाहते थे कि अपने दादा जी की तरह उनका बड़ा नाम हो। यह ललक बचपन से ही थी कि किसी तरह से अपने परिवार का नाम रोशन करना है। तय कर लिया था कि कोई ऐसा काम करूंगा जो किसी ने नहीं किया हो।

ओएनजीसी ने दिया एडवेंचर्स का मौका
सइंस से गे्रजुएशन करने के बाद डा. डबराल ने स्नातकोत्तर के लिए आट्र्स चुना। उनकी भूविज्ञान में रुचि थी, इसके कारण उन्होंने एमए भूविज्ञान में किया। इसके बाद वर्ष 1985 में उन्हें ओएनजीसी में नौकरी मिल गई। ओएनजीसी ने एडवेंचर्स के लिए उन्हें मौका दिया और उन्होंने अपने कठोर अनुशासन और कुशल नेतृत्व के माध्यम से ओएनजीसी की टीम का विभिन्न एक्सपिडिशन में नेतृत्व किया और फतह भी हासिल की।

कई चोटियों पर पायी जीत
पर्वतारोहण की बात पर डा. डबराल के चेहरे पर आज भी विजयी मुस्कान तैर जाती है। वह बताते हैं कि ओएनजीसी का जो इन दिनों मिशन एवरेस्ट चल रहा है, उसकी सोच ओएनजीसी के कारपोरेट इंफ्रास्ट्रक्चर के कंट्री हेड श्री हर्षमणि व्यास की थी और अमल मैंने किया। वह ओएनजीसी टीम के इस महत्वाकांक्षी अभियान को लेकर उत्साहित हैं लेकिन उनका मानना है कि टीम को अधिक कठिन परिश्रम और चुनौतियों का सामना करना होगा, क्योंकि अभियान सबसे बड़ा और विषम है। वह इस टीम के कुछ सदस्यों को मिशन एवरेस्ट पूरा करने के लिए सक्षम मानते हैं बशर्ते वो अनुशासित रहें और टीम भावना से काम करें। डा. डबराल वर्ष 2015 के दौरान एवरेस्ट बेस कैंप करने वाली ओएनजीसी टीम के डिप्टी लीडर भी रहे। डा. डबराल ने 25,446 फीट ऊंचाई वाले कामेट पर्वत पर जीत हासिल की। इसके अलावा उन्होंने 23,392 फीट ऊंची अभिगामिन चोटी,18,515 फीट पर स्थित भनोटी चोटी पर भी वर्ष 2003 में फतह हासिल कर ली थी। उन्होंने दो नई चोटियों पर भी फतह की। इनमें टेंट चोटी जो कि 18600 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और कार्नर पीक जो कि 20172 फीट ऊंची है।

कदम-कदम पर चुनौतियां
डा. डबराल बताते हैं कि उन्हें जीवन में हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा है, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वह बताते हैं कि कामेट पर चढ़ाई के लिए ओएनजीसी ने उन्हें स्पांसर किया था, लेकिन जिस टीम के साथ थे उन्होंने मेेरे साथ स्वास्थ्य का बहाना कर मुझे एक्सपिडिशन से बाहर करना चाहा। जबकि मैं उनकी टीम के सदस्यों से कहीं बेहतर स्वस्थ था। उस दौरान मेरी उम्र 43 वर्ष थी जबकि अन्य सदस्य 30 से 35 साल के थे। लेकिन मैं ठान चुका था कि इस अभियान को बीच में नहीं छोडंूगा। उस अभियान को सेना की एक टीम भी कर रही थी। उस टीम ने मुझे अपने साथ ले लिया और तेजी से चोटी पर चढ़ने लगा। वह हंसते हुए बताते हैं कि जब चोटी पर फतह करने में महज 100 फीट बचे थे तो मेरी टीम ने मुझे अपने साथ मिला लिया। वह बताते हैं कि कठोर अनुशासन व दृढ़ निश्चय से ही पर्वतारोहण किया जा सकता है। अपने कठोर अनुशासन के कारण उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है। इसके बावजूद वह अपने इरादों से नहीं हटे।

लाहौल-स्पीति पर की पीएचडी
डा. डबराल बताते हैं कि उन्होंने जब भूगोल में पीएचडी करने की सोची तो तय किया कि कुछ अलग करना है। वह किन्नौर पर रिसर्च करना चाहते थे, लेकिन उनके गाइड ने कहा कि यदि अलग करना है तो लाहौल-स्पीति पर रिसर्च करो, इस पर किसी ने अब तक पीएचडी पूरी नहीं की है। मैंने गाइड की बात मान ली। पंजाब यूनिवर्सिटी से पीएचडी की तैयारी कर दी। लेकिन 12500 फीट की ऊंचाई पर स्थित लाहौल-स्पीति पर पीएचडी करना एक बड़ी चुनौती थी। वहां साल के नौ महीने तो बर्फ रहती है। तीन महीने ही वहां जाया जा सकता था। इसमें भी कहीं बर्फ से लकदक रास्ते, कहीं दलदल तो कहीं नाले। रिसर्च के दौरान कई बार जान जोखिम में डाली। तापमान भी शून्य से कहीं नीचे। पीएचडी में सात साल लग गये। वाइवा के लिए लंदन से कोई लेडी प्रोफेसर आयी तो उसने रिसर्च पेपर पर जो टिप्पणी लिखी, पंजाब विवि के क्लर्क उसे ठीक से समझ नहीं सके और उन्होंने लिखा कि रिसर्च पेपर रिजेक्ट हो गए। मैं निराशा के भंवर में डूब गया। वर्षों की मेहनत का यह सिला। इस बीच मेरे गाइड ने रिसर्च पेपर पर वह टिप्पणी पढ़ी तो खुश हो गये। उन्होंने मुझे बताया कि थीसिस को अतुलनीय कहा गया है। इस तरह से मुझे पीएचडी की डिग्री हासिल हुई। 

सीखने का रहा हमेषा जज्बा
डा. डबराल को सीखन की ललक रही है। ओएनजीसी की नौकरी हासिल करने के बाद यह ललक और बढ़ी। वह हिंदी और अंग्रेजी के अलावा उर्दू और पंजाबी भाषाओं को भी लिख-पढ़ लेते हैं। उन्होंने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से उर्दू में सर्टिफिकेट हासिल किया तो पंजाब यूनिवर्सिटी से पापुलेशन एजुकेशन में डिप्लोमा हासिल किया। इसके अलावा उन्होंने आईस स्केटिंग, वाटर स्केटिंग, पैरा सेलिंग, ग्लाइडिंग कोर्स भी किये। वर्ष 1998 में दार्जिलिंग के हिमालय माउंटेनरिंग इंस्टीट्यट से पर्वतारोहण में बेसिक कोर्स किया तो इसके एक साल बाद एडवांस।
उनके कई रिसर्च पेपर भी प्रकाशित हुए हैं। इनमें लाहौल-स्पीति की जनजाति की साक्षरता के बारे में उनका व एस राम का एक लेकख ज्योग्राफिकल रिव्यू आॅफ इंडिया में वर्ष 1994 में प्रकाशित हुआ। इसके एक साल बाद उनका दूसरा पेपर भी लाहौल-स्पीति के संदर्भ को लेकर उत्तर भारत में रहने वाली जनजातियों की आबादी में बढ़ोत्तरी को लेकर प्रकाशित हुई। इसके अलावा भी उनके कई शोध व लेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित किए गये। 


घर को बना लिया रिसर्च केंद्र
डा. डबराल ने अपने घर में विभिन्न प्रजातियों के डेढ़ सौ से भी अधिक पौधे लगाए हैं। यह पौधे वह पहाड़ के वातावरण के अनुकूल देश के विभिन्न इलाकों से लाते हैं। वह पहले इनको अपने घर में बने बगीचे में उगाते हैं, यदि उन्हें इसमें सफलता मिलती है तो अन्य किसानों को पौधे उपलब्ध करा देते हैं। वह बताते हैं कि कुछ पौधे व जड़ी-बूटियां पहाड़ में रोजगार का साधन बन सकते हैं। 

डा. डबराल को मिले पुरस्कार
-वर्ष 2014 में भारत ज्योति पुरस्कार
-वर्ष 2002 में ओएनजीसी हिमालयन एसोसिएशन पुरस्कार
-ओएनजीसी ने कई बार उनको साहसिक कार्यों व पर्वतारोहण के लिए सम्मानित किया
अन्य गतिविधियों में भी रहे सक्रिय
-वर्ष 1998-2000 ओएनजीसी हिमालयन एसोसिएशन का संयुक्त सचिव
-वर्ष 2007-10 सचिव, ओएनजीसी हिमालयन एसोसिएशन
-वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के समय ओंगछा के डिजास्टर सर्वे का टीम लीडर। इस टीम ने आपदा प्रभावितों की मदद की
मोथरावाला में भी मिली चुनौती
डा. डबराल को मोथरावाला में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने चार साल तक नगर पालिका के खिलाफ ग्रामीणों के साथ मिलकर संघर्ष किया, क्योंकि पालिका केदारपुरम में डपिंग जोन बनाना चाहती थी। वह कहते हैं कि उन्होंने जीवन भर की जमा-पंूजी यहां मकान बनाने में खर्च की तो इसे व्यर्थ कैसे जाने देता। इसी तरह स ेअब बाईपास का मामला भी है। वह यहां बाइपास बनाने का विरोध कर रहे हैं। उनके अनुसार सरकार के पास कोई पूर्व निर्धारित योजना नही है। ऐसे में उनके बसे-बसाए घर उजाड़ना कैसी नीति? डा. डबराल ने इस शांत इलाके में साजिश के तहत चार लाउडस्पीकर लगाने के षडयंत्र के खिलाफ भी ग्रामीणों को लामबंद किया।
डबरालस्यूं में सामूहिक खेती की पहल
डा. डबराल बताते हैं कि डबराल परिवारों ने गांव बसाने की कवायद शुरू की है। इसके तहत कई गांवों ने पानी की बहुतायत वाली 80 नाली जमीन को सामूहिक खेती के लिए लिया है। इसमें कैश क्राप की जाएगी। यह पहल है यदि योजना सफल रही तो खेती का विस्तार किया जाएगा। उनका मानना है कि पहाड़ को बसाना हम सबकी जिम्मेदारी है। इसे मात्र सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता।

साभार : उत्तरजन टुडे

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