परिवर्तन से ही होगा विकास: मोहन काला

Written by 
Published: 04 February 2017
150 times Last modified on Thursday, 09 February 2017 08:42
Rate this item
(0 votes)


परिवर्तन से ही होगा विकास: मोहन काला
-पर्वतीय क्षेत्रों में हर 25 किमी पर खुलें तकनीकी संस्थान 
-प्रदेश में औद्योगिक निवेश के लिए बने उचित वातावरण
-जनता हो जागरूक: करे फैसला, क्या सही-क्या गलत

प्रदेश के नामी उद्यमी और समाजसेवक मोहन काला राज्य गठन के बाद से पर्वतीय क्षेत्रों की उपेेक्षा और वहां के पिछड़ेपन को लेकर बहुत चिंतित हैं। उनका कहना है कि प्रचुर प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद हमारे नेताओं में दूरदर्शिता का अभाव है और अकर्मण्यता के चलते पहाड़ पर विकास नहीं हो पा रहा है। पिछले 17 वर्षाें में भी सरकार यहां बुनियादी सुविधाएं नहीं जुटा सकी है, ऐसे में यहां पर्यटन और उद्योग में निवेश कैसे आकर्षित होगा। वह मानते हैं कि जब तक व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक विकास होना संभव नहीं है। प्रदेश के विभिन्न मुद्दों पर उनसे हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश:- 
आप पिछले लंबे समय से श्रीनगर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में समाजसेवा कर रहे हैं। गांवों में किस तरह की समस्याएं हैं।


अलग राज्य हासिल करने के लिए जो अवधारणा थी, उसके पीछे हमारे गांव थे। सब चाहते थे कि पर्वतीय गांवों का विकास हो। गांव के अंतिम छोर तक विकास की किरण पहंुचे और पलायन रुके। पहाड़ आबाद हों। विडंबना है कि राज्य गठन के 17 साल बीत चुके हैं लेकिन अब तक हमारे नीति-नियंता विशेषकर राजनेता न तो अल्पकालीन और न ही दीर्घकालीन ऐसी नीति बना सके, जिससे पहाड़ आबाद हो सकें। पलायन का क्रम लगातार जारी है। पहाड़ खाली हो रहे हैं। सबसे अहम बात यह है िकइस अवधि में गांवों में बिजली-पानी, शिक्षा-स्वास्थ्य, सड़क आदि बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। ग्रामीण रोजगार सृजित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किये गये। गांवों में शिक्षा का स्तर बहुत कम है। शिक्षा का आधार रोजगारपरक होना चाहिए था लेकिन शिक्षा का पुराना ढर्रा ही चल रहा है। गुणवत्तपरक शिक्षा की कमी है। ऐसे में जब गांव में रहने वाले लोगोें को अपने नौनिहालों का भविष्य और रोजगार की चिंता सताती है तो वह मैदानों का रुख कर लेते हैं। गांवों की हालत बहुत सोचनीय है पर नेता वहां वोट के लिए जाते हैं और फिर पांच साल दोबारा रुख नहीं करते। दिल्ली या देहरादून के एसी कमरों में बैठ ग्रामीणों की किस्मत का फैसला होता है।

पहाड़ के पिछड़ेपन और बेरोजगारी के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
देखिए, प्रकृति ने हमें प्रचुर संसाधन दिये हैं। हिमाचल प्रदेश के मुकाबले में उत्तराखंड के पास अधिक प्राकृतिक संपदा है। हमारे पास नदियां हैं, गाड-गदेरे हैं, सुंदर पहाड़ हैं, झरने हैं, जड़ी-बूटियां हैं। जैविक उत्पाद हैं। देश में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है कि जहां चार धाम हों। और सबसे अहम बात कि मानव संसाधन भी हैं। मानव संसाधन के लिए दो अहम जरूरतें होती हैं-स्वस्थ दिमाग और स्वस्थ शरीर। उत्तराखंड में बुद्धिजीवियों की कमी नहीं। हम केरल के बाद सर्वाधिक साक्षर हैं और स्वस्थ शरीर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड ही देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां दो-दो रेजीमेंट यानी गढ़वाल और कुमाऊं रेजीमेंट हैं।
इसके बावजूद हम प्राकृतिक संपदा को रोजगार में बदलने की कारगर नीतियां नहीं बना सके। हम भले ही दावा कर रहे हैं कि उत्तराखं डमें औसत आय बहुत अधिक है लेकिन यदि पहाड़ व मैदान की बात की जाए तो हालत बहुत खराब है। सरकारी नीतियां और लापरवाही इस दशा के लिए जिम्मेदार हैंै। हमने अपने संसाधनों का सदुपयोग नहीं किया। 

राज्य की इंडस्ट्रियल पालिसी को आप कितना कारगर मानते हैं?
कोई भी नीति तभी सफल होती है जबकि उस नीति के समस्त पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया गया हो। नीति में खामियां होने से इसकी सफलता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए जरूरी है कि उसके लिए एक वातावरण तैयार किया जाए। यानी कनेक्टिविटी, कम्युनिकेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर। हमारी नीति ऐसी नहीं है। सरकार चाहती है कि निवेश हो, पर औद्योगिक वातावरण कहां है? हिल पालिसी बनी है लेकिन संसाध्न तो विकसित ही नहीं किये गये। सतपुली या सुमाड़ी की बात की जाए तो यहां औद्योगिक निवेश की बात हुई है लेकिन संसाधन हैं कहां जो यहां निवेशक आएं।
जो निवेश करेगा, उसे करों में राहत के साथ ही अन्य सुविआएं भी चाहिए। पहाड़ में सड़कें अच्छी कहां हैं? जहां प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र बनाए गये हैं वहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। हमें निवेशकों को मैदान के मुकाबले पहाड़ में अधिक सब्सिडी और करों में छूट देनी होगी। उनके लिए संसाधन विकसित होंगे, माहौल तैयार होगा और निवेशकों को लगेगा कि उन्हें लाभ होगा तो ही वे निवेश करेंगे, नहीं तो ऐसी नीतियां बनेगी तो बहुत लेकिन कारगर साबित नहीं होगी। इंडस्ट्री पालिसी के लिए औद्योगिक संगठनों का भी सहयोग लेना चाहिए। 

स्किल डेवलपमेंट एक बड़ा सवाल है। किस तरह से स्किल्ड लेबर तैयार किया जा सकता है?
बुनियाद रोजगारपरक शिक्षा की है। आज पर्वतीय इलाकों में 12वीं कक्षा तक साइंस की शिक्षा हासिल करने के लिए नौजवानों को गांव से मीलों दूर जाना पड़ता है। जो दूर नहीं जा सकते हैं उन्हें न चाहते हुए भी कला विषय लेने पड़ते हैं। ऐसे में उनका भविष्य शुरू होने से पहले समाप्त हो जाता है। और वह क्लर्की और मजदूरी के सिवाय कुछ नहीं सोच पाते। सरकार को चाहिए था कि वह ग्रामीण इलाकों में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करती। गांव के बच्चों को आज भी आईटीआई पाॅलीटेक्निक या इंजीनियरिंग करने के लिए शहर आना पड़ता है। दूसरे यदि कहीं संस्थान हैं भी तो उनमें क्वाॅलिटी एजुकेशन का अभाव होता है। ऐसे में जब प्रतिस्पर्धा होती है तो ग्रामीण बच्चे पिछड़ जाते हैं। सरकार को चाहिए कि गांवों में 25 किलोमीटर के दायरे में ही तकनीकी शिक्षण संस्थान खोलें ताकि गरीबों के बच्चे भी तकनीकी शिक्षा हासिल कर सकें। हमारे यहां के नौजवान तकनीकी शिक्षा न मिलने पर अनस्किल्ड रह जाते हैं। ऐसे में जब वह नौकरी के लिए संघर्ष करते हैं तो उनके हाथ निराशा ही लगती है। 

पर्वतीय इलाकों में लघु एवं कुटीर उद्योग कितने सफल हो सकते हैं? 
हमारे प्रदेश में लघु एवं कुटीर उद्योगों की ही जरूरत है। गांवों के निकट इन उद्योगों को स्थापित किया जा सकता है। सरकार को संसाधन जैसे-कोल्ड स्टोरेज व मार्केटिंग के लिए साधन मुहैया कराने होंगे। हमारे यहां हथकरघा के अलावा कई ऐसे उत्पाद हैं, जिनसे रोजगार मिल सकता है। माल्टा, बुरांश का जूस शहद व मशरूम के अलावा जड़ी-बूटी पर आधारित दवाई की छोटी इकाईयां भी लगाई जा सकती हैं। इसमें बड़ी संख्या में ग्रामीणों को रोजगार मिल सकता है और पलायन को रोकने में भी यह योजना कारगर साबित हो सकती है, बशर्ते सरकार इस दिशा में गंभीरता अमल करे। 
पर्यटन भी रोजगार का एक बड़ा साधन हो सकता है। क्या कारण है कि हम पर्यटन उद्योग को हिमाचल की तर्ज पर विकसित नहीं कर पा रहे हैं?
जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि हमारे यहां प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है, लेकिन नीति अच्छी न होने से हम सैलानियों को अधिक आकर्षित नहीं कर पाते हैं, जो हमारे यहां आते भी हैं उनका अनुभव बुरा होता है। यदि हम पर्वतीय इलाकों में प्र्यटन के लिए जाएं तो सबसे बड़ी समस्या अच्छे होटलों की है। तीर्थाटन के लिए आए सैलानी किसी भी तरह से गुजारा कर लेते हैं लेकिन जो घूमने आते हैं उन्हें सुविधाएं चाहिए जो हम उन्हें मुहैया नहीं करा पाते। श्रीनगर से गुप्तकाशी तक शौचालय का अभाव है। अच्छे होटल नहीं हैं, सड़कें नहीं हैं, सरकार ने 17 वर्षाें में नये पर्यटन स्थलों को विकसित नहीं किया। चार धाम यात्रा को छोड़ दिया जाए तो पर्यटन का सारा बोझ नैनीताल और मंसूरी पर ही है। गढ़वाल में तो पर्यटन को विकसित करने का प्रयास भी नहीं किया गया है। जरूरत इस बात की है कि पर्यटन नीति धरातल पर बने और बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं। 

पर्वतीय इलाकों में कृषि और बागवानी से क्या आर्थिकी में सुधार संभव है?
बिलकुल, उत्तराखंड जैविक उत्पादन करने वाला एक बड़ा प्रदेश बन सकता है। मैदानों में पानी में केमिकल मिलने से ही उत्पाद जहरीले हो रहे हैं। ऐसे में यदि हम अपनी खेती का वैज्ञानिकी करण करें और नकदी फसलों पर ध्यान दें तो इससे गांवों की तस्वीर व तकदीर बदल सकती है। प्रदेश सरकार ने कोदा झंगोरे के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है वह काफी कम है। सरकार यदि एमएसपी में घाटा भी हासिल करती है तो भी सरकार को यह घाटा उठा लेना चाहिए। यदि किसानों को प्रोत्साहन मिलेगा तो रोजगार भी सृजित होगा। सरकार को इन उत्पादों को स्वयं खरीदना चाहिए और मार्केट सुविधा देनी चाहिए। हमारी नकदी फसलें रोजगार का साधन बन सकती हैं। 

राज्य में विकास किस तरह से होगा? क्या क्षेत्रीय दलों की विकास में कोई भूमिका होगी? 
परिवर्तन से ही विकास हो सकता है। राजनीति में नये चेहरे आने चाहिए। नहीं तो वही ढाक के तीन पात। यूकेडी का बिखराव प्रदेश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा। जनता में भी जागरुकता की कमी है। परिवर्तनलाने के लिए जनता को जागरुक करना होगा, तभी अकर्मण्य नेताओं से पीछा छूटेगा। जनता को यह जानना होगा कि क्या उनके लिए अच्छा है और क्या बुरा। दलों की अंधी दौड़ में शामिल होने का अर्थ है कि प्रदेश को एक बार फिर से विकास की होड़ से बाहर करना। यदि क्षेत्रीय दल ईमानदारी से काम करते तो आज हालात कहीं बेहतर होते। हमारे प्रदेश की जनता को दिल्ली का मंुह नहीं ताकना पड़ता।

 

साभार : उत्तरजन टुडे

 

Quick Menu

History of Dehradun
Eating Out
Drives
Shopping Mall
Schools
Colleges
Hobby
Social Services

ADVENTURE

 

DESTINATION

       

TEMPLES

 

TREKKING