दरिद्र रंगमंच का धनवान कलाकार श्रीश डोभाल

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Published: 25 February 2017
235 times Last modified on Friday, 24 February 2017 16:05
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देहरादून के होटल सिद्धार्थ का कांफ्रेंस रूम नीली जींस ओैर धारियों वाला लाल सा कुर्ता पहने, सिर पर टोपी लगाए एक दुबले-पतले व्यक्ति से मिला। नाम,श्रीश डोभाल। निर्देशक श्रीश ने उत्तराखण्ड के दरिद्र थियेटर को अपनी कला और प्रतिभा के धन से समृद्ध बनाने का काम किया है। उत्तराखण्ड में रंगमंच व श्रीश एक दूसरे के पूरक हैं। वह विगत तीन दशक से उत्तराखण्ड के रंगमंच को नया आयाम देने में जुटे हैं। श्रीश का दिल पहाड के लिए ही धडकता है, यही कारण है कि वह नेशनल स्कूल आॅफ ड्राम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से पासआउट होने के बाद मुम्बई या दिल्ली में बसने की बजाय ऋषीकेश आ गये और यहीं से थियेटर को जिन्दा करने में जुट गये, तीन दशक की इस लंबी व संघर्षमयी रंगमंच की यात्रा को लेकर श्रीश से हुई बातचीत को शब्दों में पिरोने की एक कोशिश।

विज्ञान का छात्र कला से लगाव 

श्रीश डोभाल का जन्म ऋषीकेश में हुआ। उनके पिता सतीश चन्द्र डोभाल सप्लाई विभाग में थे तो माता विद्यावती एक गृहणी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बादशाहीथौल के प्राइमरी स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने श्रीसुमन देव, देहरादून के साधुराम इंटर कालेज और गांधी इंटर कालेज से स्कूली शिक्षा पूरी की। डीबीएस से बीएससी की। विज्ञान पढ़ते-पढ़ते उन्हें कला की रुचि लग गई। कालेज में थियेटर किया नहीं लेकिन टाउन हाल में होने वाले नाटकों का मंचन देखने पहुंच जाते थे। यहीं उन्हें अपना पहला गुरू मिला। एडवोकेट अभिनंदा ने उन्हें थियेटर का कहकरा सिखाया। इस बीच देहरादून में थियेटर पर एक वर्कशाॅप लगी। इसमें नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा (एनएसडी) के निर्देशक वंशी कौल आए थे। वर्कशाॅप में उन्होंने थियेटर की बारीकियों के बारे में जानकारी दी। इससे थियेटर के प्रति लगाव और गहरा गया। 

रामलीला में बंदर व राक्षस की भूमिका

श्रीश कहते हैं कि थियेटर के प्रति आकर्षण पहली बार रामलीला देखकर आया। वर्ष 1960 की बात है। चंबा में रामलीला का मंचन होता था। मंचन के दौरान राम व रावण की सेना के लिए बंदर और राक्षस की जरूरत होती थी। तो एक बार मैं मुखौटा पहनकर बंदर बना तो एक बार राक्षस। इससे मैं रोमाचिंत हुआ। बचपन का यह रोमांच कब थियेटर की ओर ले गए, पता ही नहीं चला। कालेज के दिनों कला मंच और वातायन ग्रुप से जुड़ गया। जाना चाहता था सेेना में पर पहुंच गया थियेटर में।

 नेषनल स्कूल आॅफ ड्रामा का सफर

रंगमंच में कुछ कर गुजरने की ठान कर मैं एनएसडी पहुंच गया। एनएसडी में दाखिला आसान नहीं था। लेकिन मेरी ललक व लगन ने इस बाधा को पार करवा दिया। एनएसडी में मेरे सपनों को पंख मिल गए। एनएसडी में मुझे अभिनय में दाखिला मिला था। इस दौरान मैंने 15-16 नाटकों में काम किया था और तीन नाटकों का निर्देशन भी किया। एनएसडी में रहते हुए मैंने शिमला में आठ मार्डन कवियों की कविताओं पर काम किया। इसे देखने के लिए मशहूर फिल्म अभिनेता अनुपम खेर और रोहताश (भाभी जी घर पर हैं के तिवारी जी ) भी देखने के लिए आए। यह दोनों भी एनएसडी में सीनियर रहे। 

मुंबई की तुलना में उत्तराखंड को प्राथमिकता

एनएसडी से कोर्स पूरा करने के बाद ही श्रीश को टीवी सीरियल हम लोग का आफर मिला। इसके साथ ही फैलोशिप भी। श्रीश ने हम लोग की तुलना में फैलोशिप को प्राथमिकता दी। उनके अनुसार वह जीवन में कभी भी काम मांगने के लिए मुंबई नहीं गए। वर्ष 1984-85 में फैलोशिप में उन्हें पहाड में थियेटर को खड़ा करने की चुनौति मिली। उन्हें देेहरादून व नैनीताल से इतर उत्तरकाशी,कोटद्वार, पुरानी टिहरी में मार्डन थियेटर की शुरुआत करनी थी।

एक चादर, थैला 250 रुपये और अनगिनत सपने

श्रीश डोभाल के संघर्ष की असल कहानी यहां से शुरू होती है। एनएसडी करने के बाद थियेटर में शून्य गढ़वाल में कला के रंग भरने की कठिन चुनौती थी। नवम्बर की सर्दी के दिनों में एक थेला, ठंड से बचने के लिए चादर और जेब में महज 250 रुपये के साथ ढेरों सपने लेकर श्रीश उत्तरकाशी में थियेटर खड़ा करने के लिए बस से रवाना हो गये। न तो यह पता था कि ठहरेंगे कहां, खाएंगे क्या, पैसे तो थे पर इतने कम कि कुछ ही दिन का गुजारा होता। शायद हप्ते भर। पर कहते हैं कि जहां चाह-वहां राह।

कामरेड कमलाराम नौटियाल ने मदद को बढ़ाए हाथ

मुझे किसी ने बताया था कि कामरेड कमलाराम नोैटियाल थियेटर को शुरू करने में मदद कर सकते हैं। बस से उतरने के बाद मैंने अपना थैला एक दुकान पर रखा और कामरेड नौटियाल से मिलने चला गया। किस्मत से कामरेड नौटियाल मिल गये थे। उन्हांेने मुझसे पुछा कि रहोगे कहां, तो मैंने कहा, तय नहीं। उन्होंने कहा कि मेरे घर रहो। और मुझे रहने की जगह मिल गई। इसके बाद मैं स्कूल और कालेजों में जाकर छात्र-छात्राओं को नाटक के प्रति जागरुक करता। पर मुसीबतों का तो अंत ही नहीं। नाटक की रिहर्सल शुरू होती तो लड़कियां एक-दो दिन आती और फिर परिजन उन्हें रोक लेते या सवाल करते कि देर से क्यों आ रही हो, आदि-आदि। फिर क्या , उनके घर जाकर परिजनों से झगड़ा करना पड़ता। इस तरह से उत्तरकाशी में नाटकों की शुरुआत की गई। 

पहाड़ में जीवत होने लगा रंगमंच 

श्रीश जब अपने रंगमंच के संघर्ष को बयान कर रहे थे, तो मैं सोच रहा था कि कला के इस पुजारी की जिंदगी की तरह ही बेतरतीब ढंग से कहानी को संवारूंगा कैसे? इस कहानी में हो भी यही रहा है। पर दिल के तार झंकृत करने के लिए किसी कहानी को पूरा सुनना जरूरी है? कथा का कोई भी अंश आपको भावुक या विचलित कर सकता है। श्रीश की अथक मेहनत, लगन, हौसले और संघर्ष की दास्तां ऐसी है कि कहीं से भी सिरा पकड़ लो। पिरामिड की तरह। श्रीश ने नबे के दशक में उत्तराखंड में थियेटर को एक नया आयाम दिया। उन्होंने उत्तरकाशी, टिहरी, श्रीनगर और गोपेश्वर में भी रंगमंच की दुनिया के शून्य को कला रंगों से भर दिया। 

टीवी व फिल्मों से भी रहा नाता

हम लोग सीरियल की आफर ठुकराने के बाद उन्होंने सीरियल गूंज-अनगूंज और महात्मा में भी अभिनय किया। बात बापू की सीरियल में उन्होंने गांधी की भूमिका निभाई। वर्ष 1964 में उन्होंने प्रख्यात फिल्म निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म परिणति में डाकुओं के सरदार की छोटी लेकिन प्रभावशाली भूमिका की। इसके अलावा डा. अंबेडकर पर बनी इंग्लिश फिल्म में भी काम किया। छोटा स्वामी में कालपात्री का रोल किया। श्रीदेव सुमन पर बनी डाक्युमेंट्री फिल्म में मुख्य भूमिका अदा की। उन्होंने रशियन फिल्म बनाने की तैयारी कर ली थी। इसमें बुनियाद सीरियल की दीपा शाही और रशियन कल्चरल सेंटर ने भी का आश्वासन दिया था, लेकिन कुछ निजी कारणों से इस प्रोजेक्ट को मुझे छोड़ना पड़ा। 

गढ़वाली फिल्म गीता और नंदा राजजात

विडंबना है कि राज्य गठन के बाद भी उत्तराखंड में थियेटर व सिनेमा को प्रोत्साहन नहीं मिला। यही कारण है कि प्रतिभा होने के बावजूद उत्तराखंड के कलाकारों का भविष्य अनिश्चतता व दरिद्रता में ही बीतता है। श्रीश ने इसी दरिद्रता को दूर करने की कोशिश की है। वह थियेटर को आय से जोड़ना चाहते हैं। उनका कहना है कि हिंदी थियेटर को प्रायोजक नहीं मिलते हैं, इस कारण हिंदी थियेटर दरिद्र है। इसे प्रोफेशनल बनाया जाना चाहिए। वर्ष 2008 में उन्होंने गढ़वाली फिल्म गौरा का निर्देशन किया। लेकिन इस फिल्म को परदे पर नहीं उतारा जा सका। इसे एक डाक्युमेंट्री फिल्म की तर्ज पर रिलीज किया गया। अब इस को अगले वर्ष रिलीज करने की तैयारी है। श्रीश ने चार-पांच डाक्युमेंट्री फिल्में भी बनाई हैं। 

वर्ष 1987 में श्रीश डोभाल ने नंदा राजजात पर एक सेल्यूलाइड फिल्म का निर्माण व निर्देशन किया। इस फिल्म का निर्माण पिछले 27 साल से अधूरा रहा। इस फिल्म के लिए उन्होंने अपने पिता के पीएफ से पैसा लिया था। वर्ष 2014 में उन्होंने एक बार फिर अपने जीजा सुरेश उनियाल जो कि उन्हें प्रोत्साहित करते हैं, से उधार लेकर इस फिल्म को पूरा किया। इसके बाद इसे कान फिल्म फेस्टिवल में शामिल करने के लिए आवेदन किया। लेकिन यह रिजेक्ट हो गई, क्योंकि इसके विजुअल कमजोर थे। 

15 भाषाओं में किया है नाटकों का निर्देषन

बहु आयामी प्रतिभा के धनी श्रीश डोभाल ने देश-विदेश की 15 भाषाओं में नाटकों का निर्देशन किया। इनमें हिंदी, गढ़वाली, कोंकणी, मराठी, कन्नड़, बंगाली, आदि शामिल है। हाल में उन्होंने उत्तरकाशी में विलियम शेक्सपियर के ओथेलो नाटक का गढ़वाली में निर्देशन किया है। इस नाटक के एनएसडी में शामिल होने की उम्मीद है। उनका कहना है कि हिंदी थियेटर को भी कमर्सियल करने की जरूरत है। जब तक यह थियेटर कमर्सियल नहीं होगा तब तक हिंदी रंगमंच को लेकर उदासीनता बनी रहेगी। रंगमंच को प्रोत्साहन देने के लिए वर्कशाॅप, प्रशिक्षण और स्टेट लेबल की प्रतिस्पर्धा की जानी चाहिए। वह मानते हैं कि उत्तराखं डमें सुविधाएं नहीं हैं थियेटर नहीं हैं जो हैं भी वो इतनी महंगी हैं कि वहां नाटकों का मंचन करना आसान नहीं है। वह कहते हैं कि थियेटर को कमर्सियल न करने के लिए कसूरवार भी हम ही हें। पूरे उत्तराखं डमें एनएसडी से निकले महज 50 ही ग्रेजुएट होंगे। दरअसल यहां सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में हमारे सामने आदर्श नहीं हैं। हिमानी शिवपुरी, स्वर्ण रावत, जहूर आलम अच्छा काम कर रहे हैं।

क्षेत्रीय सिनेमा को मिले प्रोत्साहन 

उनके अनुसार गढ़वाली व कुमाऊंनी सिनेमा को दर्शक इसलिए नहीं मिल पाते हैं कि उनका कथानक कमजोर होता है या सोच का दायरा सीमित होता है। उनको अनुभव भी नहीं होता है। तकनीक व कैमरा के मामले में भी हम पिछडे़ हैं। राज्य में अच्छा इंस्टीट्यूट नहीं होने से भी नुकसान हो रहा है। अच्छी प्रतिभाओं को मंच नहीं मिल पाता है। संस्कृति विभाग फंड का रोना रोता है। एक आडिटोरियम तक नहीं है। 

जंग अभी जारी है...

श्रीश रंगमंच की दुनिया में तमाम झंझावत के बावजूद उत्तराखं डमें कला को स्थापित करने की दिशा में जुटे हुए हैं। वह जल्द ही एक बड़े प्रोजेक्ट की तैयारी में हैं इसके अलावा टिंचरी माई पर भी फिल्म बनाने जा रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि सफलता की मंजिल मिलेगी जरूर।

साभार:उत्तरजन टुडे

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