उत्तराखंड का लोकभाषा आन्दोलन

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Published: 09 February 2017
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उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं के सामने संकट

मानो या न माना आज हमारी भाषाएं संकट में हैं। इनके बालने वाले साल-दर-साल कम हो रहे हैं आर यह सब इतनी कमिक और धीमी प्रक्रिया से हो रहा है कि हमें खतरे का अहसास तक नहीं हो पा रहा है। लकिन हजारा साल परानी काई संस्कृति या भाषा अचानक ही संकट में नहीं आती। लगभग पिछली दस शताब्दिया से माखिक और लोकपरंपरा के माध्यम से आगे बढते हए हमारी भाषाएं जिन्दा है। यहां तक कि उन्होंने अनक एतिहासिक उथल-पुुथल, भखमरी आर गदिश के दसरे दिन भी दखे। तब भी ये हमारे दनिक जीवन, परपराओं और क्रियाओं को शब्द, अर्थ और अभिव्यक्तियां देती रहीं लेकिन आज रोजगार, शिक्षा, बाजार और प्रशासन-कहीं पर उपयोगिता न होने से लोग खुद ही अपनी भाषा की न केवल उपेक्षा करने लगे हैं अपितु उसे तुच्छ भी समझने लगे हैं। हमारे समाज मंे आज अपनी भाषा के प्रति न तो आकर्षण है, न भविष्य को लेकर कोई चिंता, उलटे समाज भाषायी हीनताग्रंथि से पीड़ित है। संस्कृति के नाम पर हमारा रुझान गीतों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित है। लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रम ग्लैमरस, दमक और कलरफुल होने के कारण लोगों को आकर्षित तो करते हैं और समाज को भावनात्मक तुष्टि भी प्रदान करते हैं मगर भाषा को आगे नहीं ले जाते। स्वतन्त्रता के पश्चात् गढ़वालियों में वास्तविक भाषायी चेतना का विकास हुआ और गढ़वाली में रचनात्मक स्तर पर भी एक माहौल बना मगर वह भी भावनात्मक ही अधिक था फलतः दूसरी भाषाओं की तुलना में हमारी भाषाओं को जहां होना चाहिए था वहां तक हमारी भाषाएं नहीं पहुंच सकीं। ऐसा भी नहीं कि पहले कुछ नहीं लिखा गया या लिखा जा रहा था लेकिन जो कुछ लिखा जा रहा था ज्यादातर स्वान्तः सुखाय था और उस समय गढ़वाली साहित्य को किसी प्रकार की सामाजिक स्वीकृति, मान्यता और प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी। इसी परिप्रेक्ष्य में हमें अपनी लोकभाषाओं के अस्तित्व पर आए संकट को समझना होगा जो आज बहुत गहरा गया है। 

स्वतंत्रता के पश्चात् गढ़वाली 
स्वतन्त्रता के पश्चात् लोकभाषायी परिदृश्य काफी बदला। लेकिन सरकार और समाज से उसे कोई महत्व न मिलने से लोग अपनी भाषा से दूर होते गए। सच तो यह है कि आजादी से पूर्व व बाद में गढ़़वाली ही नहीं उत्तराखण्ड की सभी भाषाओं की इतनी ज़्यादा अनदेखी हुई कि वे अपनी ज़मीन/मूल भूमि से कटने लगीं-विशेषतया रचनात्मकता के स्तर पर तो बहुत ही अधिक। इससे उन पर अस्तित्व का संकट आ गया और स्थिति अत्यन्त शोचनीय है। समाज और सरकारी स्तर पर अपनी मातृभाषाओं का महत्व न होने से उत्तराखण्ड की नई पीढ़ी में भी अपनी मातृभाषा के प्रति अलगाव की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। यह हमारी भाषाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती और चिंता तो है ही हमारी सांस्कृतिक पहचान के लिए भी खतरा है। जाहिर है भाषा पर संकट का अर्थ संस्कृति पर खतरे से भी हैै।

 भाषायी चेतना का वास्तविक विकास
भाषा भले ही समाज के बीच रही हो लेकिन समाज ने कब उसे अपनी पहचान से जोड़ा या कब गढ़वालियों में भाषायी चेतना का विकास हुआ इसके लिए स्वतंत्रता के बाद वाला कालखण्ड और कारण देखने होंगे। स्वतंत्रता के उपरान्त लगभग 1950-51 से गढ़वाल की आबादी का एक बड़ा भाग रोजगार की तलाश में दिल्ली गया। संख्या की दृष्टि में यह भारत भर में कहीं भी गए प्रवासी गढ़वालियों के मुकाबले सबसे अधिक था। इनमें भी ज्यादातर लोग छोटे, अनस्किल्ड और घरेलू कामों में लगे और निम्न वेतनभोगी थे। उनमें शिक्षित लोगों की संख्या भी अधिक नहीं थी। यहां पर उन्हें अन्य लोगों की प्रताड़नाओं और टिप्पणियों का शिकार होना पड़ा साथ ही उन्होंने अनेक विकट परिस्थितियां तथा दुर्दिन देखे और अपनी जन्मभूमि और परिवार दोनों का वियोग झेला। गढ़वालियों के आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण गढ़वाली भाषा और सांस्कृतिक पहचान को लम्बे समय तक हीन से दृष्टि से देखा जाता रहा। अतः इस आन्दोलन का अपनी सांस्कृतिक पहचान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक भूख से गहरा सम्बन्ध है। दूसरी ओर हमारा समाज दूसरों द्वारा अपनी भाषा को हीनता से देखे जाने से उद्वेलित तो जरूर होता था मगर कर कुछ नहीं पा रहा था। भाषा और संस्कृति को लेकर यह दृष्टिकोण अकसर आज भी देखने को मिलता है। परन्तु इस संघर्ष ने उन्हंे नये अनुभव, विचार तथा संभावनाएं दीं फलतः उनमें उस चेतना का विकास हुआ जहां कोई व्यक्ति उसे अभिव्यक्ति देता है। यहां उसका साक्षात्कार दूसरे समाजों से भी हुआ। यहीं पर उन्होंने देश को समझा और यहीं पर उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान का बोध हुआ। यहीं पर पहली बार आज की गढ़वाली कविता ने उड़ान भरी। दरअसल हमारे समाज में भाषायी चेतना और अपनी सांस्कृतिक पहचान का वास्तविक बोध प्रवास में रहकर हुआ इसलिए भाषा के सवाल को भी सबसे पहले प्रवासियों ने ही समझा। यहीं पर गढ़वाली की गतिविधियां आंरभ हुईं। तथापि ज़्यादातर गढ़वाली लेखन स्वान्तः सुखाय की तर्ज पर ही चल रहा था। साहित्यकार अपने-अपने तक सीमित थे और भाषा-साहित्य से सम्बन्धित गतिविधियां अत्यन्त सीमित थीं। साथ ही ये इतनी छिटपुट थीं कि कोई बड़ा सामाजिक असर पैदा नहीं कर सकीं। प्रवासी समूहों ने भाषा के नाम पर सांस्कृतिक गतिविधियां भी कीं। ज्यादातर लोग इनसे संतुष्ट भी होते थे लेकिन इतना पर्याप्त नहीं था। सच तो यह है कि आम समाज में अपनी भाषा को लेकर एक हताशा-सी थी। गहरी उदासी थी। इस तरह का माहौल लगभग 1987 तक मौजूद था। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो गढ़वाल में इससे पूर्व कहीं भी गढ़वाली भाशा-साहित्य पर बहस, गोष्ठियां या कवि सम्मेलन नहीं होते थे। अगर कुछ ऐसी गतिविधियां होती भी थीं तो वे ज्यादातर दिल्ली तक सीमित थीं। 


भाषा आन्दोलन की पृष्ठभूमि 
मगर यह आन्दोलन कैसे जन्मा, पनपा, इसकी पृष्ठभूमि क्या थी, यह जानने के लिए हमें 20वीं सदी के 9वें दशक में लौटकर देखना होगा कि आखिर किस तरह एक भाषा आन्दोलन की ज़मीन तैयार हुई। दरअसल 1987 के बाद, तब गढ़वाली का भाषायी परिदृश्य बदलने लगा जब कुछ युवाओं ने दिल्ली से हटकर सारे गढ़वाल और देश के पर्वतीय आबादी बहुल नगरों जाकर विशुद्ध रूप से या पूर्ण रूप से गढ़वाली साहित्य के पक्ष में काम करने का जोखिम उठाया। वे उत्तराखण्ड के अनेक क्षेत्रों में जाकर लोगों को कनविन्स करने के साथ लोकभाषा से सम्बन्धित गतिविधियां करने लगे। इन प्रयासों से समाज में रचनात्मकता का एक नया माहौल बना। इसकी शुरुआत देहरादून में हुई और पहल की लोकेश नवानी ने। लेकिन इस आन्दोलन की भूमिका जून 1982 से बननी शुरू हुई जब लोकेश नवानी ने देहरादून में इन्दिरा कालोनी, चुक्खूवाला में 
गढ़वाली की पहली कवि गोष्ठी आयोजित की। इसमें जीतसिंह नेगी, महिमानन्द सुन्द्रियाल, हर्ष पर्वतीय, रामप्रकाश आदि कवि शामिल हुए। इसकी अध्यक्षता जयश्री सम्मान के संस्थापक बुद्धिवल्लभ थपलियाल ने की। उस समय गढ़वाली 
कवि गोष्ठी के लिए किसी को तैयार या कन्विन्स कर पाना अत्यन्त कठिन था। 1981 में ग़ढ़वाली भाषा परिषद् की देहरादून शाखा गठित हुई जिसके तत्वावधान में उन्होंने बल्लूपुर, धर्मपुर, ओ.एन.जी.सी. कालोनी, जाखन तथा खुडबुड़ा में छोटी-छोटी गोष्ठियां और चर्चाएं कीं। इनमें 10 से 15 लोग आते थे। उस समय के प्रमुख साहित्यप्रेमी मदनमोहन बहुखण्डी इन्हें नुक्कड़ गोष्ठी कहते थे। सन् 1985 में उर्वीदत्त उपाध्याय और विवेकानन्द नैथानी के सहयोग से गढ़वाल सभा में पहली कवि गोष्ठी हुई जिसमें देवेन्द्र जोशी, प्रेम गोदियाल आदि कवि शामिल हुए। इसी दौर में अरविन्द शर्मा हिन्दी में संकेत नाम से एक फोल्डर निकलाते थे। अरविन्द शर्मा और मैं इन्दिरा कालोनी में अगल-बगल के कमरों में रहते थे। उनसे प्रेरित होकर मैंने चिट्ठी फोल्डर तैयार किया। लेकिन पहले फोल्डर की करेक्शन लगाने में तीन महीने लग गए। अतः इसका पहला अंक जनवरी 1986 में प्रकाशित हुआ। इसके 6 फोल्डर निकले। लेकिन जब हमने चिट्ठी को एक पत्रिका के रूप में रजिस्टर्ड करने के लिए पंजीयक, संमाचार पत्र, भारत सरकार को आवेदन किया तो पता चला कि यह नाम रजिस्टर्ड नहीं हो सकता। तब हमने तीन नाम भेजे -चिट्ठी, बाच और धाद। पत्रिका की परिकल्पना, नाम और विचार लोकेश नवानी ने का था। इनमें से धाद श्रीमती सुशीला बडोला के नाम से रजिस्टर्ड हो गया। श्रीमती सुशीला बडोला और श्री जगदीश बडोला दिल्ली में रहते हैं और इस दंपति को अपने घर पर बरसों तक गढ़वाली गोष्ठियां आयोजित करने और कवियों को निःस्वार्थ चाय पिलाने का श्रेय जाता है। जगदीश बडोला 1977-80 के दौर में एक प्रमुख लोकभाषा एक्टिविस्ट रहे हैं। वे गढ़भारती में लोकेश नवानी के साथ काम करते रहे हैं। वे गढ़भारती कि अध्यक्ष भी रहे। क्योंकि बडोला जी और लोकेश नवानी दोनों सरकारी कर्मचारी थे अतः धाद श्रीमती सुशीला बडोला के नाम पर रजिस्टर्ड करवाई गई और फरवरी 1987 में धाद ने अपने पहले अंक के रूप में दस्तक देकर अपनी यात्रा शुरू की। धाद का प्रतीक चिह्न धाद लगाती हुई महिला का मुख केन्द्रीय विद्यालय में कला अध्यापक रहे चित्रकार रमेश क्षेत्री की कल्पना है।

 भाषा आन्दोलन का विचारः
अप्रैल 1987 से धाद देहरादून से छपने लगी। लेकिन पूरी तरह लोकभाषा की पत्रिका को चलाना अत्यन्त कठिन था। तब लोकभाषा की रीडरशिप थी ही नहीं। इसलिए पत्रिका अधिक समय नहीं चली। लेकिन भाषा के सवाल पर समाज को कनविन्स करने के लिए किसी नए प्रयोग की जरूरत थी। इस सवाल पर समाज को गोलबन्द करने की आवश्यकता भी थी। अतः लोकेश नवानी ने इस नाम से गतिविधियां जारी रखीं। स्पष्ट है जहां धाद पत्रिका बंद होती है वहां धाद संगठन की शुरुआत होती है। यहीं पर लेखक ने भाषा-आंदोलन की परिकल्पना की और अनेक युवाओं को धाद से जोड़ा जिन्होंने लोकभाषा की कमान संभाली। उन्होंने इस सवाल पर असाधारण संकल्प, प्रतिबद्धता और जुनून के साथ काम किया। ये सर्वथा अपरिचित, अनजान तथा साधारण युवा ही धाद के वास्तविक और सच्चे संस्थापक बने। 1991 तक आते-आते धाद पूरी तरह एक संगठन के रूप में स्थापित हो गई और गढ़वाली साहित्यकारों के साथ-साथ लोकभाषा के पक्षधरों के एक समूह के रूप में पहचानी जाने लगी। अतः धाद को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला। यह उत्तराखण्ड का एकमात्र ऐसा संगठन है जिसे छात्रों और युवाओं ने बनाया, पाला-पोसा तथा समय के साथ एक वैचारिक संगठन का रूप दिया। इससे पहले किसी ने ऐसा नहीं किया था। वस्तुतः धाद उस भावना का नाम था जो अपनी भाषायी अस्मिता की संरक्षा के नाम पर खड़ा हुआ। धाद उस विचार का नाम है जो हिमालय के इस भौगोलिक खण्ड की सांस्कृतिक पहचान के सवाल पर उद्भूत हुआ। धाद उस संकल्पना का नाम है जो अपनी भाषा में श्रेष्ठ और समकालीन रचनाधर्मिता की कामना और खोज करती है। उसका ध्येय अपने समाज में अपनी भाषा के सम्मान और प्रेम का वातावरण बनाना था। सैकड़ों साल की एक सांस्कृतिक विरासत के अर्थ और मूल्य को समझना और उसे बचाना था। धाद ने लोकभाषा आन्दोलन की इस अवधारणा और परिकल्पना के साथ जबरदस्त सामाजिक मोबिलाइजेशन किया। धाद से पहले लोकभाषाओं के सवाल को इतनी ताकत से कोई और नहीं उठा सका। आरंभ में इसे गढ़वाली का रचनात्मक आन्दोलन का नाम दिया और इस पर इतनी मेहनत की कि यहीं पर उत्तराखण्ड के लोकभाषा आन्दोलन की नींव पड़ी और सूत्रधार बनी ‘धाद’। 17 साल की उम्र में धाद से जुड़े तन्मय ममगाई कहते हैं कि यह अंधेरे में रास्ता ढूंढ़ने जैसा था। दरअसल लोकभाषा के पक्ष में या भाषा के सवाल पर यह अब तक का सबसे बड़ा सामाजिक मोबिलाइजेशन था। इसलिए धाद को महज एक पत्रिका या संस्था मानना कम आंकना होगा। धाद ने एकदम नए तरीके से सोचा, समझा और प्रयोग किए, जिन्हें जानना उपयुक्त होगा:-

1. इस क्रम में धाद ने महसूस किया कि जिस धरती की यह भाषा है उस मूल भूमि के लोगों में अपने भाषा-साहित्य को लेकर कोई अनुराग और चेतना नहीं है। गढवाली भाषा-साहित्य की बात उसकी मूल भूमि यानी गांवों के स्तर पर बिलकुल नहीं होती थी। वास्तविकता तो यह है कि गांवों का दैनिक बोलचाल के अलावा भाषा से कोई सरोकार नहीं है। रचनात्मकता से गांव बहुत दूर हैं। अतः धाद का मत था कि यदि भाषा कहीं बचेगी तो अपनी मूल धरती पर। इसलिए धाद ने अपने भाषा-साहित्य को उसकी मूल भूमि तक ले जाने की परिकल्पना की।
2. गढ़वाली साहित्य से सम्बन्धित गतिविधियों का संगठित स्वरूप नहीं था। 
3. अपने भाषा-साहित्य की ओर युवा बहुत कम या कहें कि बिल्कुल भी आकर्षित नहीं होते थे। 
4. पूर्ववर्ती लेखको ने नए लोगों को प्रोत्साहित नहीं किया जिससे वे अलग-थलग पड़ गए थे।
5. स्वतन्त्रता से पूर्व व उसके बाद भी सरकार ने गढ़वाली की अनदेखी की।
6. गढ़वाली भाषा-साहित्य को केन्द्र में रखकर कोई बड़े आयोजन या सम्मेलन नहीं होते थे।

अतः धाद ने लोकभाषाओं में लेखन की संभावनाओं को तलाशने के साथ-साथ उम्मीदों कोे भी जगाया और गढ़वाली रचनाकारों को एक साथ आयोजनों में बुलाकर रचनात्मक संवाद का माहौल बनाया। माध्यम के रूप में कविता को चुना। कविता दूसरी विधाओं की तुलना मे अधिक संप्रेषणीय होती है और लोगों को तत्काल जोड़ती है। इसके पीछे लोकेश नवानी थे। लोकभाषा शब्द का प्रयोग भी सबसे पहले धाद ने ही किया। लोकभाषा शब्द का प्रयोग भी सबसे पहले-पहल धाद ने ही किया। प्रखर पत्रकार भास्कर उप्रेती और तन्मय ममगाईं ने विमर्श के बाद लोकभाषा शब्द का इस्तेमाल किया जिसे लोगों ने न केवल पसंद किया बल्कि दूसरे लोगों में पहाड़ी भाषाओं को लेकर जो दुराग्रह रहा है वह कम हुआ और स्वयं यहां के लोगों में भाषायीहीनता की जो ग्रंथि और हिचक थी वह कम हुईं। भाषा के सवाल को धाद समाज के ग्रासरूट तक लेकर गई। इसके तहत धाद ने देहरादून के अलावा टिहरी, हरिद्वार, गोपेश्वर, पौड़ी, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा व कोटद्वार में सैकड़ों लोगों के साथ सैकड़ों बैठकें कीं और सैकड़ों प्रयास किए जिनमें से हम बहुतों में असफल रहे मगर कुछ में सफल हुए। वस्तुतः इन रचनात्मक प्रयासों का ही परिणाम था कि उत्तराखण्ड भर में एक भाषायी और सांस्कृतिक चेतना का प्रसार हुआ और एक वृहत्तर समाज का ध्यान अपनी भाषाओं की ओर गया। आरंभ में यह गढ़वाली से शुरू हुआ लेकिन बाद मेें धाद ने कुमाउंनी में काम करने के लिए अल्मोड़ा को एक केन्द्र बनाया और कुमाउंनी धाद का एक अंक प्रकाशित किया और अन्य गतिविधियां कीं। रेमजे इंटर कालेज अल्मोड़ा में धाद ने एक यादगार और विराट गढ़वाली-कुमाउंनी कवि सम्मेलन का आयोजन भी किया। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी. सी. तिवारी और एडवोकेट हयातसिंह रावत जो वर्तमान में पहरू के संपादक हैं, वे धाद के सहयोगी रहे हैं। 
इस रूप में धाद ने अपनी तरह की एक अलग सामाजिक यात्रा की है जिसका अपना इतिहास है। स्पष्ट है लोकभाषा आन्दोलन का इतिहास वस्तुतः धाद संगठन का है। धाद संगठन ने ही इसे बोया, सींचा और फैलाया और चलाया। इसे न तो कोई नकार सकता और न ही क्लेम कर सकता है। वस्तुतः यह उत्तराखण्ड का वास्तविक भाषा आन्दोलन था। इस आन्दोलन की सफलता और सार्थकता यह रही कि यह समूचे उत्तराखण्ड में फैला और बहुत से लोगों ने इसका अनुकरण किया। आन्दोलन संभावनाओं को जन्म देता है। गढ़वाली में एक नई लेखकीय पीढ़ी का उदय और नई चेतना का आगमन और प्रवाह इस आन्दोलन की उपलब्धि है। इस आन्दोलन में धाद ने जो प्रयोग और प्रयास किए व इसकी प्रवृत्तियां और स्वरूप क्या था या इसने क्या तरीके अपनाए इसे हम विस्तार से दे रहे हैंः-

1. भाषा को मूल समाज तक ले गई 
धाद ने इस बात को समझा कि यदि भाषा को बचाना है तो उसे उसकी धरती पर बचाना होगा, ले जाना होगा, गतिविधियां करनी होंगी। अतः धाद ने मूल समाज के बीच जाकर न केवल समाज को अपने भाषा-साहित्य के प्रति आकर्षित करने की कोशिश की बल्कि उसके प्रति प्रेम भी जगाया। भाषा और साहित्य को उसकी मूल भूमि तक ले जाने की परिकल्पना के तहत धाद ने उफरैंखाल, गोपेश्वर, स्यूंसी, बैजरौ, गवांणी, धुमाकोट, परसुन्डाखाल, लैन्सडाउन, जड़ाउखांद, रजाखेत, हल्दूखाल आदि अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में साहित्यिक आयोजन किए। गढ़वाल में यह एक नया प्रयोग था जिससे लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ। इससे समाज के अपने भाषा-साहित्य की ओर प्रवृत्त और उन्मुख होने का एक माहौल बना। इन प्रयासों से गढ़वाली भाषा और साहित्य को सामाजिक स्वीकृति के साथ-साथ रचनात्मक प्रतिष्ठा भी मिली।

2. कविता को बनाया माध्यम
यहां यह समझना जरूरी है कि गढ़वाली साहित्य जब भी और जैसा भी लिखा जाता रहा है उसकी पठनीयता थी ही नहीं। आज भी लोग गढ़वाली पुस्तकें न के बराबर पढ़ते हैं। अतः धाद ने अपनी भाषा को आम समाज तक पहुंचाने के लिए कविता को माध्यम बनाया। दरअसल लोकगीतों और गीतों के बाद कविता साहित्य की किसी भी विधा की अपेक्षा अधिक सम्प्रेषणीय है और आम समाज के समझने की दृष्टि से भी सरल और पठनीय भी। अतः कविता को माध्यम बनाते हुए धाद ने अपने समाज से अपनी कविता का साक्षात्कार करवाया बल्कि गढ़वाली कविता भी सार्वजनिक मंच प्रदान किया। इस तरह धाद ने गढ़वाली साहित्य की बात को, खासकर कविता के माध्यम से ग्रामस्तर तक पहुंचाया इसीलिए आज गढ़वाली कविता गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रों में परिचय की मोहताज नही है। 

3. लेखक को होना होगा एक्टिविस्ट
धाद ने पहली बार यह विचार दिया कि भाषा के लिए कुछ किया जाना तभी सार्थक होगा जब लेखक स्वयं एक्टिविस्ट बनेगा क्योंकि तब समाज का अपनी भाषा से खास सरोकार नहीं था और कुछ लोग ही गढ़वाली में लिख रहे थे मगर समाज साहित्यिक गतिविधियां आयोजित नहीं करता था। अतः धाद ने ही सबसे पहले यह विचार दिया था कि लोकभाषा के लेखक को एक्टिविस्ट भी होना होगा तभी भाषा बचाई जा सकेगी। धाद ने यह सब किया भी। यह इस आन्दोलन की एक प्रवृत्ति भी कही जाएगी कि आज गढ़वाली के युवा रचनाकार स्वयं में एक्टिविस्ट भी हैं। गढ़वाली भाषा-साहित्य के युवा अध्येता और शोधकर्ता डा. जगदम्बाप्रसाद कोटनाला भी मानते हैं कि सच्चा रचनाकार वास्तव में एक्टिविस्ट ही होता है। और रचनाकारों के एक्टिविस्ट बनने की जरूरत तब तक बनी रहेगी जब तक समाज या सरकार इन गतिविधियों को पूरी तरह अपना नहीं लेते।

4. रचनात्मक गतिविधियों/लेखन को संगठित रूप दिया
9वें दशक से पूर्व गढ़वाली के ज़्यादातर साहित्यकार एक-दूसरे से अनजान और अपने-अपने तक सीमित थे। उनमें रचनात्मक स्तर पर संवाद का अभाव था। दरअसल इस आन्दोलन से पूर्व के अधिकतर लेखक पूर्व में दिए भावनात्मक कारणों से ही लेखन में प्रवृत्त थे। धाद ने न केवल उन्हें एक साथ आयोजनों में बुलाकर रचनात्मक संवाद का माहौल उपलब्ध कराया बल्कि उन्हें एक-दूसरे से जुड़ने के सबसे अधिक अवसर भी उपलब्ध कराए। संभवतः गढ़वाली के इतने अधिक लेखक इससे पहले एक-दूसरे के करीब कभी नहीं आए होंगेे। इस प्रकार धाद ने इस आन्दोलन के माध्यम से गढ़वाली लेखन को भी संगठित स्वरूप दिया। 

5. युवाओं को अवसर 
धाद का यह मत भी था कि जब तक युवा अपनी भाषा से प्रेम नहीं करेगा और उसके रचनात्मक मर्म के साथ ही उसकी रचनात्मक क्षमता को नहीं समझेगा भाषा आगे नहीं बढ़ सकती। अतः धाद ने युवाओं को भाषा के सवाल पर न केवल गोलबन्द किया अपितु उन्हें गढ़वाली में सृजन की ओर आकर्षित किया और अपने आयोजनों की शुरुआत गढ़वाली के युवा रचनाकारों को अवसर देकर आरंभ की। वर्तमान समय में गढ़वाली भाषा-साहित्य की मुख्यधारा के जो प्रतिष्ठित रचनाकार नजर आते हैं उनमें से अधिकांश ‘धाद’ के भाषा आंदोलन की उपज हैं या उससे प्रेरित हैं। पुराने समय में एक और दिक्क्त यह थी कि पुराने रचनाकार किसी नए युवा को न तो आगे बढ़ाते थे और न ही उन्हें लेखन की ओर प्रवृत्त करते थे बल्कि कहना चाहिए कि उन्हें जरा भी अप्रिशिएट नहीं करते थे। मुझे याद है कि मैंने सन् 1973 से कविता लिखना शुरू किया और अनेक मंचों से कविताएं पढ़ीं। लोगों को अच्छी लगीं लेेकिन किसी स्थापित साहित्यकार ने अप्रिशिएट तक नहीं लिया। यह केवल मेरी बात नहीं थी। दरअसल पुराने साहित्यकारों ने किसी को भी आगे नहीं बढ़ाया, न वे कभी किसी को अपने साथ ले जाते थे। मगर जब धाद ने यह सब शुरू किया तो वे हतप्रभ रह गए और जब हमने अलग ही राह पकड़ ली तो वे अपने को उपेक्षित समझकर आलोचना करने लगे। इसमें गढ़वाली के सभी पुराने साहित्यकार शामिल हैं। इस आंदोलन के शुरू करने के पीछे यह भी एक कारण था। लगभग सभी इस प्रवृत्ति के शिकार थे। इसीलिए तो भजनसिंह सिंह के बाद के 40 साल के कालखण्ड को देखें तो आपको गढ़वाली में ज्यादा लोग नजर नहीं आएंगे। जबकि धाद के आगमन के बाद कम से कम 100 से भी अधिक लोग गढ़वाली लेखन का हिस्सा बने। 

धाद की आयोजन श्रृंखला
धाद का मत था कि अपनी जगह तो कोई भी गतिविधि कर सकता है लेकिन दूसरे शहर या जगह जाकर जहां कोई गढ़वाली साहित्यकार न हो वहां कोई गतिविधि करना चुनौती है। अतः देहरादून में अनेक छोटी गतिविधियां कर लेने के बाद धाद ने देहरादून से बाहर का रुख किया। इस क्रम में पहला बड़ा आयोजन 21 मई 1987 को तरुण हिमालय, हरिद्वार में हुआ।
इसके बाद श्रीनगर और फिर 18 जून को कोटद्वार और 19 जून 1988 को दुगड्डा में हुआ। अपने भाषा और साहित्य को उसकी मूलभूमि तक ले जाने की परिकल्पना के तहत धाद ने उफरैंखाल, परसुण्डाखाल, गोपेश्वर,, स्यूंसी, बैजरौ, गवांणी, धुमाकोट, परसुन्डाखाल, पोखरीखेत, लैन्सडाउन, जड़ाउखांद में साहित्यिक आयोजनों के अलावा समाज को जोड़ने के लिए अन्य आयोजन भी किए। इस तरह धाद ने गढ़वाली साहित्य की बात को, खासकर कविता के माध्यम से ग्रामस्तर तक पहुंचाया। धाद ने भाषा के सवाल पर लोगों को मोबिलाइज करने के लिए सैकड़ों लोगों से बातें कीं और सैकड़ों बैठकें कीं जिनमें कुछ सफल रही। धाद के आयोजनों की संख्या भी 100 से भी अधिक है लेकिन जिन आयोजनों से लोकभाषा के पक्ष में वातावरण बना या आन्दोलन पनपा हम उन शुरुआती आयोजनों का जिक्र अवश्य करना चाहते हैंः- 

हरिद्वार का कवि सम्म्ेलन और विचार गोष्ठी
लोकभाषा का पहला कवि सम्मेलन 21 अप्रैल 1988 को तरुण हिमालय हरिद्वार में हुआ जिसका श्रेय स्व. सुरेन्द्र पाल और चक्रधर शास्त्री जी को जाता है। इसमें गढ़वाली और कुमाउंनी दोनों भाषाओं के कवि शामिल हुए। अगले चार वर्षों में धाद ने चार बड़े गढ़वाली-कुमाउंनी कवि सम्मेलन किए। हरिद्वार के आयोजन की सफलता से हममें दूसरी जगहों पर जाने का साहस आया। 

कोटद्वार का गढ़वाली कवि सम्मेलन 
लोकभाषा आन्दोलन का दूसरा कवि सम्मेलन 18 जून 1988 को कोटद्वार में हुआ था। इस कवि सम्मेलन ने गढ़वाल में कविता के दरवाजे खोलने का काम किया। 19 जून 1988 को दुगड्डा में कवि सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें कन्हैयालाल डंडरियाल, महेश तिवाड़ी, नरेन्द्रसिंह नेगी, ललित केशवान आदि अनेक कवि शामिल हुए। इसके आयोजन में अतुल अनजान का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कोटद्वार में 25-26 जनवरी 1993 को भी एक विराट और ऐतिहासिक कवि सम्मेलन हुआ था। 

श्रीनगर का गढ़वाली कवि सम्मेलन 
धाद ने श्रीनगर में भी गतिविधियां कीं हालांकि इनका अधिक असर नहीं रहा लेकिन गढ़वाली के पक्ष में जो वातावरण बना उसे यह आगे बढ़ाने की एक कड़ी जरूर थी। श्रीनगर के आयोजनों में अनिल स्वामी का योगदान रहा। 

उफरैंखाल का गढ़वाली कवि सम्मेलन 
नवम्बर 1988 में उफरैंखाल में आयोजित कवि सम्मेलन गढ़वाल के किसी पूर्णतया ग्रामीण क्षेत्र में होने वाला पहला गढ़वाली कवि सम्मेलन था। आज इसी का परिणाम है कि उफरैंखाल व स्यूंसी-बैजरौ क्षेत्र में न केवल अनेक गढ़वाली लेखक हैं अपितु वे सामाजिक रूप से सक्रिय भी हैं। इस क्षे़त्र में रचनात्मक चेतना के प्रसार का श्रेय तोताराम ढौंडियाल जिज्ञासु को जाता है। 

पौड़ी का गढ़वाली कवि सम्मेलन 
धाद ने 25 सितम्बर 1992 को जिला परिषद् सभागार में पहला गढ़वाली कवि सम्मेलन आयोजित किया। यह एक यादगार सम्मेलन था। स्वतन्त्रता के बाद पौड़ी में किया गया यह पहला ऐसा कवि सम्मेेलन था जो विशुद्ध रूप से गढ़वाली का था। यह आयोजन गढ़वाली भाषा के विकास की यात्रा में मील का पत्थर साबित हुआ। इसी के धरातल पर पौड़ी में आज के रचनात्मक माहौल की नींव पड़ी। इसीलिए आज पौड़ी का गढ़वाली साहित्य के विकास मंे महत्वपूर्ण योगदान है।
इसके बाद श्रीनगर और फिर 18 जून को कोटद्वार और 19 जून 1988 को दुगड्डा में हुआ। अपने भाषा और साहित्य को उसकी मूलभूमि तक ले जाने की परिकल्पना के तहत धाद ने उफरैंखाल, परसुण्डाखाल, गोपेश्वर,, स्यूंसी, बैजरौ, गवांणी, धुमाकोट, परसुन्डाखाल, पोखरीखेत, लैन्सडाउन, जड़ाउखांद में साहित्यिक आयोजनों के अलावा समाज को जोड़ने के लिए अन्य आयोजन भी किए। इस तरह धाद ने गढ़वाली साहित्य की बात को, खासकर कविता के माध्यम से ग्रामस्तर तक पहुंचाया। धाद ने भाषा के सवाल पर लोगों को मोबिलाइज करने के लिए सैकड़ों लोगों से बातें कीं और सैकड़ों बैठकें कीं जिनमें कुछ सफल रही। धाद के आयोजनों की संख्या भी 100 से भी अधिक है लेकिन जिन आयोजनों से लोकभाषा के पक्ष में वातावरण बना या आन्दोलन पनपा हम उन शुरुआती आयोजनों का जिक्र अवश्य करना चाहते हैंः- 

आन्दोलन के सहयात्री 
यह सब करना सरल नहीं था। इसे करने के लिए जुनून की जरूरत थी। यह घर फूंक तमाशा देखने जैसा था। यह इसलिए भी असंभव सा था क्योंकि समाज अपने साहित्य से परिचित ही नहीं था अतः उसे विश्वास ही नहीं होता था कि वास्तव में गढ़वाली में साहित्य भी लिखा जा सकता है। फिर भी जब धाद ने पहली बार इस परिकल्पना को ज़मीन पर उतारने की योजना बनाई तब उसके पहले सहयोगी बने स्व. सुरेन्द्र पाल, चक्रधर शास्त्री और मधुसूदन थपलियाल। उसके बाद तोताराम ढौंडियाल जिज्ञासु, डा. नरेन्द्र गौनियाल और महेन्द्र ध्यानी आए। उसके बाद नवीन नौटियाल और वीरेन्द्र पंवार, विमल नेगी, चिन्मय सायर, कुटज भारती आए। वीरेन्द्र पंवार ने परसुडाखाल में धाद की कई गतिविधियां कीं
इस मूवमंेट को तब और आगे बढ़ने में मदद मिली जब आकाशवाणी नजीबाबाद के तत्कालीन कार्यक्रम अधिकारी सत्यप्रकाश हिंदवान तथा बाद में निदेशक नित्यानन्द मैठाणी ने धाद की संस्तुति पर अनेक युवा कवियों को काव्यपाठ को अवसर उपलब्ध कराया। मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि यदि इन लोगों का सहयोग उस समय न मिलता तो शायद हम जहां आज हैं वहां तक कभी न पहुंच पाते। मगर जब 1991 में धाद में इण्टर में पढ़ने वाले कुछ छात्र जिनमें तन्मय ममगाईं, राकेश पांथरी तथा कोटद्वार के रमेश घिल्डियाल आए तो इस आन्दोलन ने और भी जोर पकड़ा। इसके बाद तो पहले गढ़वाल में और उसके बाद लगभग सारे पहाड़ में लोकभाषाओं की बात होने लगी। 

आन्दोलन के सामाजिक प्रभाव 
अपनी इस यात्रा पर चलते हुए धाद 30 वर्ष पूरे करने जा रही है और भाषा के सवाल को समाज और सरकार के एजेण्डे में लाने में सफल रही है। इन 30 सालों में लोकभाषाओं के पक्ष में निरंतर कार्य करते हुए धाद ने 100 से भी अधिक कवि सम्मेलनों, विचार-गोष्ठियों, साहित्य एवं पोस्टर प्रदर्शनियों के आयोजनों के अलावा कई गढ़वाली पुस्तकों एवं गढ़वाली/कुमाउंनी पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया। आज भले ही कोई क्लेम क्यों न करे मगर सच्चाई यह है कि उत्तराखण्ड में लोकभाषाओं के लिए जो कुछ किया जा रहा है वह ‘धाद’ द्वारा बनाए गए धरातल पर ही हो रहा है या कहीं न कहीं धाद से मोटिवेटेड है। इतिहास सच को ढूंढ़े बिना चैन नहीं लेता। और जैसा कि गढ़वाली के प्रबल समर्थक और व्यंग्य लेखक भीष्म कुकरेती मानते हैं कि वर्तमान दौर उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं की यात्रा का स्वर्णकाल है तोे यह अत्युक्ति नहीं हैं। दरअसल पिछले तीन दशक उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं में, विषेषतः गढ़वाली में रचनात्मक हलचलों के लिहाज से मील के पत्थर साबित हुए हैं। इस दौरान पिछले किसी भी समय की अपेक्षा गढ़वाली में न केवल लिखने वालों की संख्या बढ़ी हैै वरन् साहित्य में गुणात्मक परिवर्तन भी दिखाई देता है।
यहां यह भी कहना जरूरी है कि आज जितने भी ग्रुप भाषा के सवाल पर एक्टिव हैं या प्रकाशन हो रहे हैं ज्यादातर धाद से बाद के हैं और जो पहले से भी हैं तो उन्होंने भाषा के एजेण्डे पर धाद के बाद काम किया और वे कहीं न कहीं धाद से प्रेरित हैं। 
वस्तुतः यह परिवर्तन धाद द्वारा बनाए गए रचनात्मक आन्दोलन ही प्रतिफल है जिसके सामाजिक प्रभावों को हम इस प्रकार देखते हैंः- 
1. इस आन्दोलन का सबसे पहला असर यह हुआ कि अनेक लोगों ने पूरे कमिटमेंट के साथ विशुद्ध रूप से भाषा के सवाल पर काम करना शुरू किया। इससे इस आन्दोलन को व्यापकता मिली और अनेक लोग इसके उत्तरवर्ती लोग बन गए।
2. धाद ने अपने भाषायी साहित्य को सामाजिक स्वीकृति दिलाने के साथ-साथ रचनात्मक प्रतिष्ठा भी दिलाई।
3. धाद ने लोकभाषा आन्दोलन के बिखरे स्वरूप को संगठित रूप दिया 
4. गढ़वाली भाषा गढ़वाल विश्वविद्यालय में ऐच्छिक विषय के रूप में स्थान पा चुकी है।
5. भाषा राज्य सरकार के एजेण्डे में आ गई।
6. साहित्य अकादमी भारत सरकार का ध्यान गढ़वाली की ओर आकृष्ट हुआ। 
7. गढ़वाली को संविधान की 8वीं अनुसूची में लाने के लिए प्रयास हो रहे हैं। 
8. ‘धाद’ द्वारा आरम्भ किए गए रचनात्मक आंदोलन से बने वातावरण के बाद विगत तीन दशकों में गढ़वाली भाषा साहित्य की 50 से भी अधिक पुस्तकंे छप चुकी हैं।
. इतना ही नहीं अनेक लोगों ने धाद से पे्ररित होकर या धाद से अलग होकर यही सब गतिविधियां कीं। इससे भी
गढ़वाली भाषा का आन्दोलन आगे बढ़ा। 

निष्कर्ष
‘धाद’ की यह यात्रा मूलतः उसकी सृजनयात्रा है जो आज भी अनवरत रूप से जारी है। अपनी भाषायी विरासत को बचाने के लिए धाद के माध्यम से की गई अपनी इस सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा पर हम गौरव की अनभूति करते हैं। हालांकि, जैसा कि यूनेस्को की वर्ष 2009 में भाषाओं पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की जिन भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है उनमें गढ़वाली और कुमाउंनी भी शामिल हैं। जाहिर है यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हमारी भाषा को कोई नहीं बचा सकता। हम उसे बचाने का यत्न कर सकते हैं कहीं ऐसा न हो कि आने वाले 100 सालों में हमारी भाषाएं इतिहास की बात न रह जाए। लेकिन हमारी भाषाओं में जो सुन्दरतम है वह बचा रहे तो हिमालय के इस हिस्से का यह समाज, संस्कृति और सभ्यता भी बची रहेगी।a

Lokesh Nawani

Lokesh Nawani is with versatile personality,Garhwali poet,social activist ,founder of social organistaion Dhad .Lokesh Nawani was born in 1956 in a Himalayan village Gawani, Kimgadigadh, Pauri Garhwal, Uttarakhand Lokesh Nawani is a poet, a critical commentator of Garhwali literature, have been editor of Dhad a Garhwali literature magazine but his contribution is more sought for his Garhwali Kavita Andolan or Garhwali Poetry Movement in rural Garhwal though social activities. After shifting to Dehradun, Lokesh Navani became involved in publishing Dhad a monthly magazine from Dehradun. Dhad has provide us many Garhwali creators because Nawani inspired tens of youth to take creating Garhwali language literature. However, due to financial problem, Lokesh had to stop publishing the respected magazine . Dhad a brain child of Lokesh Nawani has branches at most of the places in Garhwal. Social organisation Dhad take social acts in hand,Dhad organises seminars on social political and economical issues of Uttarakhand. Lokesh will always appreciated for his collection of poetries Funchi and for Garhwali Poetry Movement in rural Garhwal and being god father of tens of Garhwali poets.

Website: Lokesh-nawani-social-activist-dhad-founder-garhwali-poet-writer

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